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स्वतन्त्र, सर्वश्रेष्ठ , हिन्दू


भारत मनीषियों का देश रहा है किंतु मनीषियों की सैंकड़ो पीढ़ियाँ सहस्त्राब्दि की दासता झेलने के बाद राजनैतिक रूप से स्वतंत्र अवश्य हो गयी है किन्तु स्वतंत्र मनन करने की क्षमता उनमें न जाने कब आएगी?
मनन की अपेक्षा रट रट कर और नकल करके परीक्षा में सफल होने हो उद्यत यह पीढ़ी न जाने कब अपने सच्चे स्वरूप को पहचानेंगी?
हम ऋषियों की संतान है, हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और महायोगी श्री कृष्ण के वंशज हैं, हमारी नस नस में गतिमान रक्त हमारे प्रबुद्ध पुर्वजों की बुद्धिमत्ता और विश्व को सत्यता के अन्वेषकों और विचारकों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की और बहता प्रवाह ही है। हम भी वही है किंतु अपने स्वरूप को भुला बैठे हैं और उन लोगों के पीछे रेल के डिब्बों की तरह दौड़ रहे है जिन्हें ज्ञान का ककहरा हमने सिखाया है।(पश्चिमी देशों के पीछे)
अन्य सम्प्रदायों की बात करें तो वें किसी एक व्यक्ति द्वारा चलाये गये सम्प्रदाय हैं और उनके अनुयायियों को केवल उनकी बातों का अनुसरण करना ही सिखाया जाता है ताकि वे अपनी बुद्धि का प्रयोग न कर सके और और सम्प्रदाय के चलाने वाले को ही भगवान की तरह पूजते रहे। ये सम्प्रदाय हमारे चारों और ऐसे फैल गए है जैसे वटवृक्ष के चारों और अमरबेल की लता।और हम दावा भले ही यह करते है कि हम उन मानने वालों में से नही है किंतु मन से उन्ही की भांति दुर्बल हो रहे है, संकीर्ण हो रहे है और अपनी बुद्धि को भी बकरी के गले में बंधी रस्सी की तरह एक छोटे से वृत्त में चरने के लिए ही स्वतन्त्र कर पाते है।
हम सनातन हैं। हमारे धर्म में किसी एक व्यक्ति के विचारों में बंधकर जीवन यापन करना नही सिखाया जाता। हमे सिखाया जाता है कि बुद्धि को बढाओ और अपनी प्रबुद्धता का जनसामान्य के हित में प्रयोग करो। हमारे शास्त्र-नियत कार्य किसी एक व्यक्ति द्वारा अभिहित नही है;अपितु लाखों ऋषियों, मुनियों और मनीषियों के सैंकड़ो वर्षों के तप, चिन्तन और गहन मनन के बाद व्युत्पन्न ज्ञान द्वारा जीवन जीने की कला सिखाते हैं। 100 वर्षों तक बिना शारीरिक,मानसिक और सामाजिक दुःख का जीवन जीने के लिए दक्ष बनाते है।
हमारे शास्त्र यह नही कहते कि आप उसकी चारदीवारी में ही बंध कर रहो; अपितु आपकी स्वतंत्र सोच को सहर्ष स्वीकार करते हैं। तभी तो हमारे धर्म में 6 आस्तिक, 3 नास्तिक दर्शनों का बराबर सम्मान होता है और हमें इन दर्शनों के अपना होने पर गर्व होता है। तभी तो हम 'वसुधैव कुटुम्बकम' की धारणा के सबसे बड़े पोषक हैं। तभी तो हम दुनियाँ की सबसे समृद्धशाली संस्कृति के वाहक हैं। तभी तो हम विश्वगुरु हैं।
अतः मेरे मित्रों! आप सनातन भारत की सनातन धर्म के पोषक बनो और ज्ञान प्राप्त करने की चिन्तन, मनन और निदिध्यासन की परंपरा के साथ अपनी स्वतंत्र विचारधारा के अनुरूप जीवन यापन करके समाज में उदाहरण बनों ।

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