तो पहले बात करते है शून्य के खोज के इतिहास की। इस कहानी में राजा महाराजा नही हैं। इसमें मुनि व मनीषी भी नही हैं। इसमें है साधारण लोग जिन्हें आजकल आम लोग कहा जाता है। वे लोग जो आग जलाना सीख चुके हैं। पहिये से अपने श्रम की बचत करना भी सीख चुके हैं। खेती करना सीख चुके हैं। पशु पालना सीख चुके हैं। और उन पशुओं की गणना करना भी कुछ हद तक सीख चुके हैं।जमीन के एक टुकड़े को चारों और से लक्कडों तथा झाड़ियों आदि से घेरकर उनमें अपने पशुओं की सुरक्षा करना सीख चुके है।
काम में एक दूसरे का हाथ बंटाना सीख चुके हैं। इसके लिए समय को टुकड़ो में तोडना भी उन्होंने जान लिया है। वे घड़े में रेत भरकर उसके नीचे छेद करके रेत के रित जाने को एक घट और दिनरात 24 घट में बाँट चुके है। अब उन्होंने रेत के स्थान पर जल लेकर समय के और छोटे भाग बना डाले हैं। घड़े के रीतने को 60 भागों में विभक्त कर चुके हैं। किंतु 60 ही क्यों? 100 क्यों नही? वह इसलिए कि अभी तक उन्होंने इतनी ही गिनती सीखी है।वही घट आगे चलकर घण्टा बन गया और वही घट घड़ा बन गया। घड़े का आकार और छोटा हुआ तो घड़ी बन गयी और उसके बाद इस शब्द में कोई परिवर्तन नही हुआ।
पुनः पीछे लौटते हैं।उनके बाड़े में पशुओं की सँख्या बढ़ने लगी। आम लोगों को गिनने में कठिनाई होने लगी तो उन्होंने गोटियों का सहारा लिया । वे बाड़े से एक एक पशु निकालते और एक एक गोटी को एक इधर से उधर रखते जाते। फिर पूरा दिन पशुओं को चराने के साथ साथ गोटियों को ढोना पड़ता।
किसी आम आदमी ने गोटियों के भार को कम करने की एक बहुत सुंदर युक्ति निकाली। उसने बाड़े के द्वार पर दो गड्ढे खोदे। जब पशु निकलने आरम्भ हुए तो उसने हाथ की अँगुलियों के बराबर 10 गोटी दाएं गड्ढे में डाली और जैसे ही 10 हुई उसने सब गोटियाँ निकली और दाएं गड्ढे में एक गोटी डाल दी। अब केवल एक गोटी से संख्या 10 आ चुकी थी।अर्थात 10 पशु बाहर जा चुके थे।अब फिर दाएं गड्ढे में10 गोटी रखी और 10 होते ही सारी गोटियाँ निकालकर दाएँ गड्ढे में एक और गोटी डाल दी। अब दाये गड्ढे में दो गोटियाँ थी और बाएं में एक भी नही और पशु हो गए 20 ।इस प्रकार दोनों गड्ढो में 9-9गोटियाँ डालकर 18 गोटियों से 99 पशु गिनने सुलभ हो गए। किन्तु 99 से अधिक हुए तो????
तो फिर बायीं और एक और गड्ढा ।यदि तीसरे गड्ढे में दो गोटियाँ पड़ी है और दायीं और के दोनों गड्ढे खाली है तो भैया सँख्या 200 है।
इस प्रकार मनुष्य ने 60 से ऊपर गणना करनी सीख ली। अब संख्याओं को एक मानक चिह्न देने की बारी थी। तो एक गोटी के लिए १ दो गोटियों के लिए २ और इसी तरह क्रमशः ३,४,५,६,७,८,९ चिह्नों का निर्धारण हो गया किन्तु खाली गड्ढों के लिए क्या?? अरे भई जो उनका आकार वही ।। एक भी नही अर्थात शून्य ० । यह गणना और गणित के क्षेत्र में एक क्रांति थी। अब 60 चिह्नों की नही अपितु केवल 10 चिह्नों की आवश्यकता मात्र थी और इनसे अनन्त तक की संख्याओं को गणना सम्भव हो गयी। इस प्रकार खाली गड्ढों अर्थात एक भी नही के लिए ० का अविष्कार हो गया। यह भी एक प्रागैतिहासिक अविष्कार है।केवल स्थान बदलने से अंको के मान बदल जाते है और दायीं और आने पर शून्य महत्वपूर्ण हो जाती है। स्थानीय मान का ज्ञान भी शून्य के ज्ञान के समकालीन ही है। इस ज्ञान ने भारत को गणित के क्षेत्र में भी शिरोमणि बना दिया।।
अब बात करे आर्यभट्ट की तो आर्यभट्ट ने पहली बार मध्य एशिया और यूरोप को शून्य से परिचित कराया। तो उन्हें तो यही लगेगा कि आर्यभट्ट ने शून्य की खोज की। वे तो यह भी कहते है कि भारत की खोज वास्कोडिगामा ने की। क्या उससे पहले भारत कहीं खोया हुआ था? नही भारत भी शून्य की भांति सदियों से यहीं फल फूल रहा है।
तो मित्रों! अब तो आपको समझ आ गया होगा कि आर्यभट्ट से पहले 100 कौरव कैसे गिन लिए गए। कोई सुझाव हो तो आप सादर आमंत्रित है।
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