हिन्दू धर्म भी ऐसा ही पक्षी है। इसके तो दो नही बल्कि जातियों के रूप में हजारों सिर हैं। सब एक दूसरे से सदा झगड़ते रहते हैं। सब को पता है कि उनका पेट तो एक हिंदुत्व ही है किन्तु एकदूसरे को नीचा दिखाने के लिए उस पेट में न जाने कैसे कैसे विचाररूपी फलों का भोजन भरते रहते है। यह बात उनके सिरों में स्थित मस्तिष्क में क्यों नही घुसती कि पेट में हुए इस संक्रमण के कारण स्वास्थ्य तो सभी का खराब होगा।
जाति को हम मनु की देन मानते है; जबकि मनु ने तो तत्कालीन समाज के वर्णों के कर्तव्य निर्धारित करके समाज में समता को निर्धारित किया था। अर्थात मनुष्य जो कि कर्म करने के लिए स्वतंत्र है उसके कर्मगत रूचि को देखते हुए सभी कर्मों की आवश्यकता को केंद्र में रखकर वर्णों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक वर्ण के कर्तव्यों को दूसरे के अधिकार के रूप में निर्धारित किया था। इससे सामाजिक सामंजस्यता बढ़ी। किन्तु जब कर्तव्यों पर स्वार्थ भारी होने लगा तो वर्ण जातियों और उपजातियों में बंटने लगे और इस तरह एक धर्म के कर्मकार विचित्र पक्षी के सिरों की तरह अपने ही मूल कर्तव्यों से भटक कर अपने ही शरीर अर्थात हिंदुत्व को नष्ट करने लगे। लोग मनु से ही ईर्ष्या करने लगे। मनु के समय एक पिता के चार पुत्र चार अलग अलग वर्णों के होते हुए भी सङ्ग जीवन व्यतीत किया करते थे। स्वार्थ द्वारा कितनी विसंगतियां भर दी गयी व्यवस्था में? एक वर्ण पूजनीय बन बैठा और एक को पूजा तक का अधिकार नही रहा? जाति विशेष से अकारण ईर्ष्या के विषैले फलों ने हिन्दू धर्म को तड़पने पर विवश कर दिया। यदि समय रहते हिन्दुओं ने मूल सनातनी चेतना को नही चेताया, हिन्दू जातियों के संकुल से निकल कर एक हिंदुत्व के ध्वज तले नही आया तो उस पक्षी की भाँति ही हिन्दू नाम का पक्षी भी मर जायेगा ।
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