एक व्यक्ति था। एक बार उसने सोचा कि यह आकाश मेरा है और मैं इसकी रक्षा करूंगा। यह सोचकर उसने एक बड़ा सा घर बनाया है और उसके आकाश की सुरक्षा करने लगा और संतुष्ट हो गया। किंतु काल का कराल बड़ा हठी होता है। घर टूट गया और वह व्यक्ति शोकमग्न हो गया। दुख से वह विकल हो गया। फिर उसने एक छोटा सा घर बनाया और उसके आकाश की सुरक्षा करने लगा और इसी में संतुष्ट हो गया। किंतु काल के क्रूर हथौड़े से वह भी कितने दिन बच सकता था? टूट गया। और व्यक्ति फिर से दुख और शोक से भर गया। उसके दुखों का कुछ सानी नहीं था। फिर उसने एक झोपड़ी का निर्माण किया तथा उसके आकाश पर अपना अधिकार जमकर उसकी सुरक्षा करने लगा और उसमें ही संतुष्ट रहने लगा। किन्तु कोई प्राकृतिक आपदा उसे भी नष्ट करके चली गई। मनुष्य फिर से भारी शोक में डूब गया। अब उसने एक घड़े का निर्माण किया और यह मेरा आकाश है ऐसा सोच कर उस घटाकाश की रक्षा में मग्न हो गया और संतुष्ट रहने लगा। किंतु काल ने उसे भी ग्रास बना लिया। अब वह मनुष्य पुनः दुख के सागर में डूब गया। वह मनुष्य एक सनातनी हिंदू था और जिस आकाश की वह रक्षा करता था वह था उसका धर्म। जैसे ही धर्म पर अधिकार की बात उसके मन में आई तभी से उसके दुख और सुख का एक निरंतर चलन आरंभ हो गया। मैं अपने चारों ओर संकीर्ण विचारों का एक घेरा बनाता चला गया जो धीरे-धीरे संकीर्ण संकीर्णतर होता चला गया। और इस संकीर्ण आवरण में व्यक्ति की संतुष्टि मैं केवल मनुष्य की मनुष्यता को पतन की ओर धकेल की रही बल्कि उसके धर्म को भी संकीर्ण करती चली गई। वास्तव में सनातन धर्म तो खुला आकाश है हमें उसमें स्वतंत्र विचरना है। उस आकाश को संकीर्ण करके उस पर कब्जा नहीं करना जिस दिन यह बात प्रत्येक हिंदू की समझ में आ जाएगी उस दिन वह अपनी संकीर्णताओं को छोड़कर वास्तविक धर्म को अपनाकर अनंत, विभु, कालातीत, सच्चिदानंदघन, परमपिता परमात्मा को खोज पाएंगे। और उसी दिन से भारत विश्व को नेतृत्व देने योग्य हो जाएगा। इसके लिए हमें हिंदुओं को हिंदुत्व की शक्ति का अनुमान कराना होगा। उन्हें अंधविश्वासों और आडंबरों से बाहर निकालना होगा। और यह कार्य लोकतंत्र में वोटों की राजनीति करने वाला हमारा नेतृत्व नहीं करेगा। इसके लिए तो हमारे ज्ञानी संत पुरुषों को ही आगे आना होगा। उन्हें नेतृत्व संभालना होगा। देववाद से ऊपर उठकर सत्य की खोज करने वाले सतगुरु ही आगे आकर इस संकीर्णता को समाप्त कर सकते हैं और उन्हें आगे आना ही चाहिए।
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