यह पढ़कर कुछ लोग मुझे मूर्ख समझने की भूल कर सकते हैं। मैं किसी के सोचने के निजी अधिकारों में टांग तो अड़ा नही सकता,जो यह भूल करते हैं करे! किन्तु जब हम अपने धर्म के मूल को खोकर उदाहरण स्वरूप कही गयी कहानियों और प्रतीकों में ही भटककर भी धार्मिक हो सकते है तो चरखे को कोसने से देशभक्त भी हो सकते है। यह सामान्य सी भूल हमारी संस्कृति के लिए कितनी घातक हो सकती है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो नग्नता हम अजंता, एलोरा के समय से त्याग कर सभ्यता के आवरण में ढाँक चुके थे उसे केवल इसलिए उतार फेंक रहे है कि एक बाहरी संस्कृति ने हमे बताया कि इससे आधुनिक बना जाता है। अभी तक तो हम मूल ज्ञान से हटकर प्रतीकों में ही खोये हुए थे अब बिना विचार किये असभ्य लोगों का अनुसरण भी करने लगे है। आश्चर्य की बात तो यह है कि हम जानते है कि यह धूर्त, धोखेबाजों और चरित्रहीन लोगो का अनुसरण है किन्तु इस अनुसरण को ही हमने सभ्यता का चोला पहना दिया।
इस झूठ के विरोध का प्रतीक है चरखा। कभी एक कम्पनी ने हमे लूट कर कंगाल कर दिया था, आज हजारों कम्पनियाँ भारत में आकर अपना कारोबार जमा रही है जिसमे भारत का धन बाहर जा रहा है। हमारी खून पसीने की कमाई में ये कम्पनियाँ हमे भोग और विलासिता के अतिरिक्त कुछ भी तो नही परोस रही है!इस शोषण के विरोध का प्रतीक है चरखा। हमारी शिक्षा नीति में मैकाले की पद्धति का अंधानुसरण हमारे कीमती 15- 16 वर्ष खोकर भी हमें बेरोजगार होने की ही योग्यता प्रदान करता है । इसके विरोध का प्रतीक है चरखा। चीन जैसे देश हमें इसीलिए आँखे दिखा रहे है कि हम उनके सस्ते सामान के लालची हो गए है। यदि हम स्वदेशी सामान के अतिरिक्त अन्य सामान न खरीदने का निश्चय कर लें तो चीन को भारी हानि हो सकती है और वह अपनी औकात में आ जायेगा। इस स्वदेशी और स्वाभिमान का प्रतीक है चरखा।
मेरे नवजवान मित्रों! चरखे को खुली आँखों से देखकर केवल लकड़ी के चक्र, लोहे के तकुवे, फूंस की चमरक तथा सूत के धागे का संयोजन मात्र न जानो। उसके पीछे के रहस्यों का भी अवलोकन करो। चरखा जिस प्रयोजन में स्वतंत्रता संग्राम में प्रयुक्त हुआ था उसी प्रयोजन में आज भी चरखा अपना महत्व रखता है। प्रतीकों से बाहर निकलकर मूल में प्रवेश करो तो ही आप लोग हिन्दू होने पर,भारतीय होने पर तथा वैदिक ज्ञान के वाहक होने पर गर्व का अनुभव करोगे।
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