एक बार एक मंदिर में भजन संध्या चल रही थी और उसमें एक गायक झूम झूम का गा रहा था...
गोरा जी ने बो दी हरी हरी मेहँदी
शिव जी ने बो देइ भांग ...
पी के भांग भोला मारे झटके,
भोला न्यू मटके भोला न्यू मटके।
ये भजन तो मुझे किसी भी कोण से नही लग रहे थे। तेज संगीत की धुन पर भाँडो को नाच के नाम पर कूदने को मिल रहा था और भंगड़ो को भांग भरी चिलम मिल रही थी।
मैं सोचने पर विवश हुआ कि यें शिव का महिमामंडन कर रहे है या चरित्रहनन? आखिर ऐसा क्या है कि शिवजी को इतना बड़ा व्यसनी के रूप में मंडित किया गया। क्या शिव वास्तव में भांग पीते थे?
ऐसा नही था। वास्तव में वे भगवतभक्ति में चरम सीमा तक डूबे थे। मानव तन में प्रकट हुए थे तो मानव के सम्मुख स्वयं को आदर्श के रूप में रखने को भोलेनाथ ने तप का मार्ग चुना था और ब्रह्म प्राप्ति में मग्न रहते थे।
योग वशिष्ठ में कहा गया है कि शास्त्र और सज्जनों की संगति से अपनी बुद्धि को शुद्ध और तीक्ष्ण करना चाहिए। यही योगी के योग की पहली भूमिका है। इसका नाम 'श्रवण' भूमिका है।गोरा जी ने बो दी हरी हरी मेहँदी
शिव जी ने बो देइ भांग ...
पी के भांग भोला मारे झटके,
भोला न्यू मटके भोला न्यू मटके।
ये भजन तो मुझे किसी भी कोण से नही लग रहे थे। तेज संगीत की धुन पर भाँडो को नाच के नाम पर कूदने को मिल रहा था और भंगड़ो को भांग भरी चिलम मिल रही थी।
मैं सोचने पर विवश हुआ कि यें शिव का महिमामंडन कर रहे है या चरित्रहनन? आखिर ऐसा क्या है कि शिवजी को इतना बड़ा व्यसनी के रूप में मंडित किया गया। क्या शिव वास्तव में भांग पीते थे?
ऐसा नही था। वास्तव में वे भगवतभक्ति में चरम सीमा तक डूबे थे। मानव तन में प्रकट हुए थे तो मानव के सम्मुख स्वयं को आदर्श के रूप में रखने को भोलेनाथ ने तप का मार्ग चुना था और ब्रह्म प्राप्ति में मग्न रहते थे।
ब्रह्म के स्वरूप का निरंतर चिन्तन करना 'मनन' नामक दूसरी भूमिका है।
संसार के संग से रहित होकर परमात्मा के ध्यान में नित्य स्थित रहना निदिध्यासन नामक तीसरी भमिका है।
जिसमे वासना का अत्यंत अभाव है, वह ब्रह्म-साक्षात्कार से अज्ञान आदि निखिल प्रपच्च की निवृत्ति करने वाली 'विलापनी' नामक चौथी भूमिका है। इस ब्रह्मवित पुरुष को संसार स्वप्नवत प्रतीत होता है।
विशुद्ध चिन्मय आनन्दस्वरूप की प्राप्ति पांचवी भूमिका है। इस भूमिका में जीवन्मुक्त पुरुष आधे सोये और आधे जागे हुए पुरुष के सदृश रहता है।
यदि आप किसी भांग का नशा करने वाले व्यक्ति को देखोगे तो पाओगे कि वह व्यक्ति भी आधे सोये और आधे जागे व्यक्ति के सदृश ही दिखाई पड़ता है। महायोगी शिव के इसी गुण के कारण प्रतीकों में उलझी आस्था ने शिव जी को भंगड़ घोषित कर दिया। दुर्भाग्य यह है कि इस बात को समझने का प्रयास कुछ लोग मात्र इसलिए नही करते कि शिव जी का नाम लेकर समाज में उनका व्यसन मान्य हो जाता है। ऐसे लोग दुसरे लोगों को भी यही समझाने का प्रयास करते है कि व्यसन में कोई बुराई नही है क्योंकि भगवान भोले शंकर भी तो व्यसनी थे।
ऐसे लोगो को एक बार शिवजी की तपोभूमि कैलाश एक बार जरूर घुमा देना चाहिए ताकि उन मूर्खो को पता चले कि वहाँ तो प्रकृति पत्थर- शिला , बर्फ,और अति शीतल जल के अतिरिक्त कुछ भी नही उपजाती, फिर भांग वहाँ कैसे उपजायी सकती है? वहाँ तो कांग्रेस घास भी नही उगती। भांग की तो औकात ही क्या? हे शिवभक्तों ! अज्ञानता को दूर करने का समय आ गया है। कृपया पैसे कमाने के लिए भगवान का भी चरित्रहनन करने वाले गायकों की C D या कैसेट आदि न लें। स्वयं का आचरण दुर्व्यसन मुक्त करके भगवान शिव का मान बढाओ।
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