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संदेश

सच्चा संगीत

सूर्योदय में दो-तीन घंटे बाकी हो। आपके आसपास सभी सो रहे हो। मनुष्य, जीव-जंतु, पेड़-पौधे, किसी में भी कोई हलचल ना हो। ऐसे में आप उठिए। अपने पत्थरों, सीमेंट, लोहे के मकानों से बाहर निकलिए। किसी नदी के किनारे पर जाकर सुखासन, सिद्धासन या पद्मासन में बैठिए। आंखें बंद कीजिए, कमर सीधी कीजिए, हाथों को घुटनों पर रखिए। आपको कुछ देखना नहीं है, आपको कुछ सोचना नहीं है, आपको कुछ करना नहीं है, बस अपने कान खुले रखिए और सुनिए- बहता हुआ जल आपको क्या सुनाता है? मधुर संगीत! ऐसा मधुर संगीत कि पंडित भीमसेन जोशी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और अनु मलिक जैसों का संगीत उस संगीत के सामने क्षुद्र नजर आने लगे। तब आप कैसा महसूस करेंगे? क्या आप रेडियो या टेलीविजन के शोर को सुनना पसंद करेंगे? क्या तब भी आपके मन में यह विचार आएंगे कि यदि मैं घर में होता, अपनी रजाई में होता, सामने टेलीविजन चला लेता और उसमें संगीत चलाता तो कितना अच्छा होता? नहीं! कभी नहीं। आप एक बार यह प्रयोग करके तो देखिए। आज से हजारों साल पहले एक ग्रीक दार्शनिक ने कहा था कि संगीत ही एकमात्र ऐसी विधा है जो मन को शांति प्रदान करती है और दर्शन से बड़ा...

शब्द, अर्थ और पूर्वाग्रह

शब्द, अर्थ और परमतत्व मानव बुद्धि के अलग अलग सोपानों पर निर्भर है। शब्द मुख्यतः कानों का विषय है। कानों के ईयरड्रम पर जो ध्वनि तरंगे टंकार करती है वे ही शब्दों के रूप में ग्रहण किये जाते हैं। जब यें शब्द सनसेरी नर्व्स द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचाए जाते हैं तो मस्तिष्क उनका तुरन्त विश्लेषण करता है और उनके अर्थों को ग्रहण करके रिस्पॉन्स देता है। इसी प्रकार अर्थों को जिह्वा द्वारा शब्दों के रूप में बाहर करने का काम भी मस्तिष्क करता है मोटर नर्व्स के माध्यम से जो मस्तिष्क से आदेश लेकर इंद्रियों को सक्रिय करती हैं। इसीलिए तो महापुरुष कहते हैं कि आपने जो कहा वह आप पर निर्भर है और सुनने वाले ने जो सुना वह उस पर निर्भर है। वास्तव में आप अपने अर्थ को शब्दों में ढालकर सम्प्रेषित करते है और अन्य व्यक्ति उन शब्दों को अपने ही अर्थ में ग्रहण करता है। विभिन्न परिस्थितियों में समान शब्दों के विभिन्न अर्थ बन जाते हैं, क्योंकि सभी परिस्थितियां मनुष्य के मन में एक पूर्वाग्रह का अर्द्ध पारदर्शी आवरण बना देती हैं। इनमें से छनकर जब शब्द मन मे अर्थ के रूप में निरूपित होते हैं तो उसी परिस्थिति में रहने वालों क...

आप अपने बच्चों को क्या देखना चाहते है: नचिकेता या भांड

तीन दिन से भूखा प्यासा यम के द्वार पर यम की प्रतीक्षा में बैठे बालक के संकल्प से प्रसन्न हो यम ने बालक नचिकेता को तीन वर माँगने को कहा। एकदम आपके सम्मुख ऐसी परिस्थिति आ जाये तो आप क्या मांगेंगे? धन तो एक वर में मिल जाएगा।उसके बाद धन से आप कोई भी भौतिक सुख,वस्तु या विषय खरीद सकते हो, बाकी दो वरों में आप क्या माँग करेंगे? यदि आप नचिकेता के स्थान पर होते तो क्या करते? दो पल पढ़ना बन्द करके सोचिए। जो आपके मन मे आया उसे नीचे के कमेंट बॉक्स में लिखिये और फिर आगे पढ़िए। हाँ! पूरा पढ़ने के बाद अपने कमेंट में कोई परिवर्तन मत करिए। . . . नचिकेता ने प्रथम वर यह माँगा कि जब वह यम के पास से वापस जाए तो उसके पिता उद्दालकजी उस पर गुस्सा न करे और उसकी बात पर विश्वास करके उसे गले से लगा ले। दूसरा वर यह माँगा कि उसे देवों की प्राप्ति कराने वाली अग्निविद्या का ज्ञान दिया जाए । और तीसरे वरदान में उस बालक ने तत्वज्ञान प्राप्त करने का वर माँगा। इतना पढ़ने के बाद क्या आप समझ पाए कि नचिकेता ने क्या माँग लिया? प्रथम वर: - जीवन की धारा ऐसी है कि इसमें सबको तैरना तो अकेले अकेले है किन्तु बहना एक साथ है। एकस...

बालक में बुद्धि

एक कवि सम्मेलन में डॉ अरुण जैमिनी बता रहे थे कि अब बच्चे तो पैदा ही नही होते;बाप ही पैदा होते है। अपने हास्य अंदाज में वें नई नस्ल की बुद्धिमत्ता की बड़ाई कर रहे थे किन्तु मैं सोचने लगा कि क्या अभी इतने चतुर बच्चे पैदा होते हैं?क्या अतीत बुद्धिमान बालकों से खाली था। अतीत में झाँकते झाँकते में बहुत पीछे तक चला गया और उसमें ऐसे बहुत से ऐसे बच्चे दिखाई दिए जिन्होंने इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी है।उनमें से एक बच्चे की बुद्धिमत्ता के कुछ पहलू आप के समक्ष रख रहा हूँ। बहुत पुराने समय मे राजा उद्दालक का एक पुत्र था नचिकेता।राजा ने एक महायज्ञ किया जिसमें अपनी सारी सम्पत्ति दान कर दी। उस समय का सर्वश्रेष्ठ धन था गाय। राजा से सारी गाय दान कर दी । वे गाय भी जो बूढ़ी और जर्जर हो चुकी थी। दूध देने में असमर्थ थी। पाँच वर्षीय नचिकेता की बुद्धिमत्ता की प्रथम बानगी यहाँ देखिये। उसने इसका सीधे तौर पर विरोध न किया क्योंकि पिता से बात करने की मर्यादा भंग होने का खतरा था। उसने बुद्धिबल का प्रयोग किया और पिता से पूछा कि आप मुझे किसे दान देंगे? पिता समझ न पाए कि बालक कहना चाहता है जब आप दान देते समय केवल स...

कैसे आये रामराज्य??

आजकल कोई भी राजनैतिक दल रामराज्य का सपना दिखाने लगे तो आम जन आँखे बंद करके उनके पीछे हो लेते है।जनता ये किसी से नही पूछती कि रामराज्य स्थापित करने की उन दलों की क्या कार्ययोजना है। दल भी ऐसा कोई पक्ष नही रखते जिससे उनके कथित रामराज्य के विषय में भान हो सके। रख भी कैसे सकते हैं; वास्तविकता तो यही है कि न तो किसी भी दल को रामराज्य की ही समझ है और न ही रामराज्य लाने की कोई नीति। श्री राम के जीवन मे झाँका जाए तो हम देखते है कि वशिष्ठ जी के आश्रम में शिक्षा पूर्ण होते ही श्री राम के पास रामराज्य का एक स्पष्ट दृष्टिकोण था। वह यह कि पहले आतताइयों और शत्रुओं से राज्य को सुरक्षित किया जाए। इसका प्रारम्भ उन्होंने महऋषि विश्वामित्र के आश्रम में राक्षशी चाची ताड़का और उनके अनुचरों को मौत के घाट उतार कर आरम्भ कर दिया था और उसके बाद वनवास में रहते हुए दक्षिण तक सभी शत्रुओं का संघार करके ही वापस लौटे। यदि उनके मन में रामराज्य का स्वप्न नही होता तो वें वनवास के समय उत्तर दिशा में किसी हिमालय की कन्दरा में ही गुजार देते! वैसे भी अवध को उत्तर दिशा से कोई खतरा नही था। राम को वन में ही तो निवास करना था फ...

सोमरस पर भ्रम

कुछ लोग सोमरस को शराब के रूप में प्रचारित करने के दुष्चक्र चला रहे हैं। उनके लिए मैं कहना चाहता हूं कि सोम का अर्थ है शीतलता। सोमरस भारतीय इतिहास में पिया जाने वाला पेय पदार्थ था जो मन को शीतलता प्रदान करता था, तनाव से मुक्ति दिलाता था, मनुष्य को पापमुक्त रहने की प्रेरणापथ पर चलाता था । यज्ञ में इसका सेवन किया जाता था। निश्चित रूप से सोमरस आजकल के चरणामृत की भांति का पेय था जो मानव में पवित्रता के संकल्प के लिंगरूप में प्रयुक्त होता था। सिखों की परंपरा में अमृत चखने से मनुष्य संकल्प से सिख बन जाता है। सनातन परम्परा में सोमरस का जगह जगह पर वर्णन मिलता है। प्रत्येक वर्णन में शुद्धता का भाव है। यह भी इसी अमृत की भाँति शुभ संकल्प के संस्कारों पर पिया जाने वाला पेय था किन्तु दुर्भाग्य से इस पेय को बनाने की विधि कालान्तर में इसी प्रकार विलुप्त हो गयी जैसे कठ उपनिषद में वर्णित अग्निविद्या। इसी बात का फायदा उठाते हुए भारतीय संस्कृति को अपमानित करने के लिए धूर्त लोगो ने इसे नशीला पेय के रूप में प्रचारित किया। दर्शन पढ़ कर देखो। भारतीय दर्शनों में निकृष्टम माने जाने वाले चार्वाक दर्शन में भी...

सुख का स्थान

जब इस सृष्टि की रचना हुई तब हमारी यह पृथ्वी भी सूर्य की ही भांति अग्नि का एक तपता हुआ गोला थी। इस तथ्य पर विज्ञान की सम्मति है। जिस बात को विज्ञान प्रमाणित कर देता है उस बात को तब तक नकार पाना असंभव है जब तक कि विज्ञान ही उसे अप्रमाणित ना कर दे। इस बात पर भी प्राय सर्व सहमति है कि विज्ञान इस विश्व को पश्चिम की देन है। विज्ञान हमारी प्रकृति के भौतिक पक्ष का संश्लेषण और विश्लेषण करके प्राप्त हुए ज्ञान को हमारे समक्ष रखता है। हमारी ज्ञान परंपरा तो आधुनिक विज्ञान से अत्यधिक प्राचीन है। यद्यपि पंडित जवाहरलाल नेहरु भी डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखते हुए मैक्स मूलर आदि पश्चिमी विचारको के तर्कों के सामने धोखा खा गए। वह भी हमारी ज्ञान परंपरा की प्राचीनता को नहीं जान सके। वें आर्यों का आगमन पश्चिमी दिशा से मानते हैं और वह भी ईसा से लगभग 1000 वर्ष पूर्व। किंतु हमारी वैदिक रचनाएं इस कालक्रम से अत्यंत प्राचीन है तथा उस पर कोई भी यूरोपियन छाप नहीं है। इसलिए यह कहना सर्वथा गलत है कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं है अपितु बाहर से आए हैं। आर्य सभ्यता का विकास पूरी तरह से भारत में ही हुआ। यदि पंडित नेहरू म...

सुभाष जयंती--राष्ट्रीय पर्व

गुलामी सभ्य समाज की सबसे बड़ी दुर्बलता है । भारत देश अपने इस दुर्भाग्य को सदियों तक झेलता आया है। सबसे पहले संभवत पांडव ऐसे लोग थे जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाई थी किन्तु वह आवाज नारी सम्मान के रूप में अधिक प्रखर थी। स्वतंत्रता के लिए उठने वाली अंतिम आवाज दो महान वीर भारतीयों की थी, जिनमें से एक थे मोहनदास करमचंद गांधी; और दूसरे थे सुभाष चंद्र बोस। दोनों की आजादी प्राप्त करने के मायने तो एक थे किंतु तरीकों की दिशाएं सर्वथा जुदा थी। सुभाष चंद्र बोस जो चाहते थे की पांडवों की भाँति युद्ध करके आजादी प्राप्त की जाए किन्तु गीता में से भी अहिंसा को खोज लेने वाले गाँधी जी का मानना था कि युद्ध की अपेक्षा प्रेम, शान्ति, और अहिंसा से आजादी प्राप्त की जाए। आज की परिस्थितियों में हमें सुभाष ज्यादा सही लगते हैं किन्तु इन दोनों महापुरुषों की जीवनी पर गहराई से नजर डालें तो तत्कालीन परिस्थितियों में गाँधी अधिक सटीक लगते हैं। एक कहानी है कि एक विधवा औरत भेड़ चराकर किसी तरह अपना गुजर बसर करती थी। एक दिन एक जमीदार जो बहुत रसूखदार था तथा आसपास के सैंकड़ो गाँवों पर उसकी ज़मीदारी थी,के नौकरों ने उस व...

विवेकानन्द का महत्व दयानन्द से अधिक क्यों?

ऐसा क्यों है कि स्वामी दयानंद की अपेक्षा हम स्वामी विवेकानन्द को अधिक महत्व देते है? दोनों ऋषियों ने हिन्दू धर्म के लुप्तप्राय ज्ञान को पुनर्प्रतिष्ठा प्रदान की। दोनों ने पाखण्ड का खुलकर विरोध किया। दोनों ने हिन्दू धर्म में पुनर्जागरण का मार्ग प्रशस्त किया। दोनों ने वेद के महत्व को समझा और वेदार्थ को जगतपटल पर रखा। दोनों ने हिन्दू धर्म के सनातन सत्यज्ञान का अन्वेषण किया और अपने चरित्र से हिंदुत्व के चरित्र को दुनिया के सामने रखा। दोनों ने सनातनी मूल्यों को आत्मसात करते हुए समाज सेवा करते हुए अपने जीवन बलिदान किये। फिर ऐसा क्यों है कि स्वामी दयानंद चन्द हिन्दुओं(आर्य समाजियों) के ही प्रेरणास्रोत रह गए और स्वामी विवेकानन्द राष्ट्र के युवाओं के प्रेरणास्रोत ??? कृपया सभी प्रबुद्ध लोग इस बहस का भाग बनें।।

भीष्म के कर्मफल

अर्जुन का रोना थमने का नाम नही ले रहा था। दुर्योधन इस रोने को मगरमच्छ के आँसू सिद्ध करने में लगा था और लगातार उसे अपशब्द बोल रहा था। श्रीकृष्ण खड़े मुस्कुरा रहे थे। अन्य सभी कौरव-पाण्डव अपने अपने भाव लिए पितामह को घेरे खड़े थे। और पितामह अर्जुन द्वारा दी गयी शरशय्या पर शान्त पड़े थे। तभी पितामह भीष्म ने लम्बी सांस ली और बोले," पुत्र दुर्योधन! अपशब्दों से अपनी जिह्वा को गंदा न करो। अर्जुन! तुम भी विषाद न करो। तुम दोनों वीर योद्धा हो। तुम्हे तुम्हारा यह व्यवहार शोभा नही देता। जो कुछ भी हुआ है इसमें सब कुछ मेरे ही कर्मों का फल है। "पूरा वातावरण शान्तिमय हो गया।सब पितामह भीष्म की ओर देख रहे थे। भीष्म मुस्कुराये और बोले," केशव के मुखमण्डल पर फैली मोहक मुस्कान स्पष्ट कह रही है कि वें सब जानते हैं। तुम सब में केवल वे ही हैं जो दुखी नही हैं। इसीलिए उनके दर्शन मुझे सुकून पहुँचा रहे है। चूंकि मैंने जीवनभर ब्रह्मचर्य का पूरे मनोयोग से पालन किया है इसलिए मैं भी जानता हूँ कि यह सब कर्मफल के अतिरिक्त कुछ नही है।" युधिष्ठिर आगे बढ़े और हाथ जोड़कर बोले,"हे पितामह! हम इस पाप के ब...

नव वर्ष का सही समय

क्या आपने दिल्ली की 26 जनवरी देखी है ?जिसमें सेना मार्च पास करती है।। मार्च क्या है ? कहीं मार्च कोई प्रारंभिक बिंदु तो नहीं है, जिसको पास करके मार्च पास किया जाता है? लगभग 3000 वर्ष पहले तो ऐसा ही था; जब मार्च प्रारंभ हुआ करता था किसी भी वर्ष का। केवल भारत भूमि पर ही नहीं बल्कि वैश्विक भूमि पर भी। तब सातवां महीना सितंबर था, आठवां महीना अक्टूबर था, नौवा महीना नवंबर था और दसवां महीना दिसंबर था। और 10 महीने का होता था वर्ष। लगभग सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में जैनों के नाम पर एक महीना जनवरी बढ़ा दिया गया। जैनो एक ग्रीस देवता का नाम है । इस को बढ़ाने का काम फेबरा नामक व्यक्ति ने किया था। फेबरा ने अपने नाम से भी फरवरी नामक एक और महीना बढ़ा दिया; और इस तरह से हो गए 12 महीने। लगभग 46 ईसापूर्व में जूलियस सीजर ने 1 महीने का नाम अपने नाम पर रख दिया। यह था जुलाई। सीजर के बाद ऑगस्टीन नाम के एक राजा ने अपने नाम पर उससे अगले महीने का नाम अगस्त रखा। सीजर एक राजा था और उस के नाम वाले जुलाई माह में 31 दिन थे तो ऑगस्टीन क्यों पीछे रहता ? उसने भी फरवरी से एक दिन निकाला और इस प्रकार अगस्त में भी 31 दिन हो...

ईश्वरीय सन्तुलन और आधुनिक विज्ञान

सर्व विदित है कि मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है। पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश। इनमें किसी भी तत्व की महत्ता को न्यूनाधिक की तराजू में नहीं तोला जा सकता।। सभी समान रूप से महत्वपूर्ण है। इन सबका एक संतुलित संगठन ही शरीर है। यह संतुलन जीवो को उम्र भर बनाकर रखना पड़ता है ।जब भी कभी संतुलन में असंतुलन उत्पन्न हुआ, तो समझो शरीर बीमारियों का घर बन गया। इसलिए समझदार मनुष्य सदैव इन पंचतत्वों को संतुलित बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्न शील रहते हैं। इन तत्वों का संतुलित संगठन ही सृष्टि है; और इनमें से किसी भी एक तत्व की अधिकता या न्यूनता ही विनाश है। हमारे अनुभव में प्रायः यह बातें आती रहती हैं। समुद्र तट पर जल प्रलय, पर्वतो में भूस्खलन, प्रायः जगह-जगह लग जाने वाली आग, वायु में प्रदूषण और अवकाश की कमी या अधिकता सभी कुछ जानलेवा है। इसलिए जरूरी है कि ना केवल हमें इन पंचतत्व का सही सही ज्ञान हो, अपितु इनके संतुलन को बनाए रखने के लिए भी ज्ञान और कर्मठता दोनों हों। हमारी सनातन परंपरा में इस बात को सृष्टि के आरंभ काल में ही समझ लिया गया था। तभी तो अग्नि विद्या का उद्घोष वेदों में उपलब्ध ह...

बीमारियों को ऐसे दूर रख सकते हैं

जैसे जैसे मनुष्य भौतिक सुख लोलुप होता जा रहा है, वैसे वैसे ही उसके जीवन में बीमारियों ने अपने तंबू नहीं, अपितु महल बना लिए हैं। आप अपने चारों तरफ से दृष्टि घुमाइए, कोई भी व्यक्ति आप को पूर्ण रुप से स्वस्थ नहीं मिलता। क्या सदियों से बीमारियां हमारे पीछे इसी प्रकार से पड़ी हुई है? नहीं!! जब मन शांत था,तमोगुण मनुष्य से दूर था, उस समय बीमारियां भी हम से दूर ही थी। किंतु जैसे जैसे हम सुविधाभोगी हुए, हमने अपने शरीर को नकारा बना डाला। खाली पड़े घरों में अक्सर कुत्तों का डेरा हो जाता है, वही हाल हमारे शरीर के साथ भी हो रहा है। हमारा मन, हमारा तन, सब कुछ भोग विलास में कमजोर हो चुका है। यही कारण है कि व्याधियां हमें हर ओर से घेरे हुए हैं। मनुष्य में जैसे-जैसे बुद्धि का विकास हुआ, उसने प्रकृति से बहुत कुछ सीखा है। सबसे बड़ी बात उसने मेहनत करके खाना सीखा है। किंतु जब से मनुष्य ने दूसरे के भोजन को छीन कर अपना भोजन मानना शुरू कर दिया है, तभी से मनुष्य के शरीर में बीमारियों ने अपना घर करना शुरू कर दिया है। क्या हम अपने आपको इन बीमारियों से, इन व्याधियों से, दूर कर सकते हैं? डॉक्टरों के पास इसका ...

सुनें अनहद नाद

ब्रह्मण्ड महाशून्य होते हुए भी पदार्थसमूहों से भरा हुआ है। पदार्थ है तो गति है।गति है तो घर्षण है।घर्षण है तो कम्पन्न है।कम्पन्न है तो आवाज है। विभिन्न अवर्त्तियों, गुणवत्ता और तीव्रताओं कि आवाज नाद कहलाती है। अनन्त ब्रह्मांड में नाद भी अनन्त हैं। कुछ मनुष्य को सुनाई देते हैं।कुछ मनुष्य की सुनने की क्षमता से नीचे से गुजर जाते हैं; और कुछ मनुष्य की सुनने की क्षमता से ऊपर से गुजर जाते है। इनमें से कुछ नादों को हम वैज्ञानिक विधि से पकड़ भी लेते है। विश्व मे कुछ ऐसे भी जन्तु हैं जो उन नादों को आसानी से पकड़ लेते है जिन्हें हमारी स्रोत इंद्रियां पकड़ नहीं पाती। इन्ही नादों में से कुछ नादों को बहुत सीमित मात्रा में लेकर हमारे पूर्वजों ने भाषा का निर्माण किया है।विभिन्न भाषाओं में विभिन्न नाद हैं। कुछ दूसरी भाषा के नादों से मेल भी खाते है और कुछ मेल नही भी खाते है। क्या आप कल्पना कर सकते है कि बिना पदार्थ के भी नाद उत्पन्न हो सकता है।नही कर सकते क्योंकि हमारी इन्द्रियों की पहुँच जहाँ तक होती है वहीं तक का हमें ज्ञान होता है।और कल्पना ज्ञान से बाहर तो जा नही सकती। किन्तु यदि हम इन्द्रियों से...

प्राचीन व महान कौन?अरस्तू या मनु ?

किसी भी देश के उत्थान में वहाँ की शिक्षा का अमूल्य योगदान होता है।भारत जैसा देश अपनी महान शैक्षिक परम्परा पर गर्व कर सकता है, किन्तु भारत में अपनी शिक्षा की उपेक्षा करके पाश्चात्य शिक्षा की नींव पर उत्थान के सपने देखना बड़ा हास्यस्पद है। नवीन खोजों के लिए हम प्रायः पाश्चात्य विद्वानों का अनुसरण करके ही आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। अपने विद्वानों पर से तो जैसे विश्वास ही उठ गया है।यही प्रेरणा हम अगली पीढ़ी को दे रहें हैं। किसी विषय के मूल को पढ़ाते हुए भी हम अपने विद्यार्थियों को अपने विद्वानों और उनके अनुसन्धान के विषय में बताना पसन्द नही करते।क्या अपनों का अनादर करके विकसित होने पर हम सन्तुष्टि का अनुभव कर सकते है? जीवविज्ञान में बचपन से हम जीवों के वर्गीकरण के विषय में पढ़ते थे। हमें कभी पता नही चला कि इस विषय में भारतीय मनीषियों का भी कोई योगदान है।आज भी आप विकिपीडिया उठाकर देख लीजिए किसी भारतीय का नाम उसमे नही मिलेगा । एक उदाहरण विकिपीडिया से नकल करके दे रहा हूँ-- ग्रीस के अनेक प्राचीन विद्वान, विशेषत: हिपॉक्रेटीज (Hippocrates, 46-377 ई. पू.) ने और डिमॉक्रिटस (Democritus, 465-370 ई...

दुःख , योग और हिन्दू

प्रायः ईश्वर की बनाई इस दृष्टि को दुःख का पर्याय माना जाता है। दुःख का कारण है अज्ञान,और इस अज्ञान को दूर करने के विभिन्न मार्ग दर्शन या शास्त्र के नाम से विख्यात हैं। मुख्यतः दुःख के तीन प्रकार के माने गये हैं-- 1)आधिभौतिक 2)आधिदैविक और 3)आधिदैहिक आधिभौतिक दुःख उन्हें कहा जाता है जिनका कारण भौतिक अथवा प्राकृतिक हो। जैसे भीषण गर्मी या भयंकर ठण्ड पड़ना, अतिवृष्टि व बाढ़ में सब कुछ तबाह हो जाना, भूकम्प में सब प्रकार की सम्पत्ति का नष्ट हो जाना, सुनामी आना, बादल फटना आदि आदि। इन आपदाओं को दृढ़ मन से सहन ही करना पड़ता है इसके अतिरिक्त कोई उपाय नही होता। आधिदैविक दुःख में हमारे मन बुद्धि और अहंकार को चोट पहुँचती है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, आसक्ति,आशा, तृष्णा आदि इस दुःख के कारण है; और इन सब का मूल अज्ञान है। तीसरा है आधिदैहिक दुःख; शरीर में चोट लगना, फोड़े फुंसी होना, ज्वर आना, एलर्जी होना अर्थात किसी भी प्रकार के शारीरिक रोग। आधिदैहिक दुःख से छुटकारा पाने के लिए हम प्रायः किसी डॉक्टर ,वैध या हकीम के पास दौड़ते हैं। अब प्रश्न यह है कि इन दुःखों के मूल कारण अज्ञान को क्या हम दूर करने का प...

वस्त्र और वैराग्य

भारत में वेदों पर आस्था रखने वाले आस्तिक दार्शनिक विचारधाराएं हों या जैन, बौद्ध और चार्वाक जैसी नास्तिक विचारधाराएं हो;सभी में जीवन के साथ साथ मृत्यु और मृत्यु के उपरांत, दोनों स्थितियों को अपने अपने चश्मे से देखा है तथा मानव का परमशुभ जीवन से परे मृत्यु के उपरांत ही खोजा है।किन्तु उस परमशुभ तक पहुँचने के लिए प्रयत्न सभी जीवन में ही करने है। सबसे पहला प्रयत्न है मन का अनासक्त होना और जीवन में वैराग्य होना। किन्तु वैराग्य को सनातनी महापुरुषों ने कर्तव्य के साथ जोड़ा है और नास्तिक दर्शनकारों ने कर्तव्यच्युत होने को ही वैराग्य समझा है। शायद यही कारण है कि सनातनी राजा हरिश्चंद्र हो, जनक हो, राम हो या महायोगी श्रीकृष्ण हो; ये लोग अपने सनातनी कर्तव्यों से कभी नही भागे अपितु गृहस्थ होते हुए भी सन्यासी का जीवन जिया । किन्तु बुद्ध और महावीर ने वैराग्य मि ज्वाला मन में जलते ही सर्वप्रथम गृहत्याग किया । सम्भवतः सुपात्र व्यक्तियों को योग्य गुरु न मिलने के कारण ऐसा हुआ। वेदों से दूरी भी इनके भटकाव का कारण बनी। किन्तु कहते है कि लक्ष्य वही पता है जो घर से निकलता है। घर में पड़े हुए व्यक्ति को लक्ष...

धर्म का अध्ययन क्यों ?

बाबा रामदेव की सभा लगी थी। उसमें एक MBBS किये हुए डॉक्टर बैठे थे। अतीत में बाबा के कटु आलोचक थे। समझदार थे। उन्होंने निश्चय किया कि योग और आयुर्वेद की आलोचना के लिए पहले उनके बारे में जाने और प्रयोग करें। अतः एक रोज वें बाबा के योग शिविर में जा पहुँचे। योग सीखा और अपनी प्रैक्टिस में आने वाले मरीजों को भी कुछ आसान के लिए प्रेरित करने लगे। योग के सकारात्मक परिणाम ने उनकी मनोदशा को भी बदलकर रख दिया और अब वें योगशिक्षक के रूप में निशुल्क सेवा कर रहे हैं। कुछ ऐसा ही होता है उन लोगों के साथ भी; जो हिन्दू धर्म की आलोचना करने के लिए वेदों और उपनिषदों का अध्ययन करने लगते है और सत्मार्ग को पहचान कर उस पर चलकर अपना उद्धार कर लेते हैं। कुछ लोग भोग के वश में होकर भोग सामग्रियों के लिए ही शास्त्र के अभ्यास में लग जाते है और परम् पद प्राप्त कर लेते हैं।शास्त्रों में निपुण योग्य गुरु का निरन्तर श्रवण या शास्त्रों का नियमित अध्ययन मनुष्य को सच में मनुष्य बना देते हैं। इसलिए आजकल के पढ़ेलिखे समाज में मनुष्य को चाहिए कि धूर्त के व्यख्यान सुनने की अपेक्षा स्वयं अपने धर्मग्रन्थों यथा भागवत गीता, रामायण, ...

नदी में फेन नही ,वृद्धावस्था के श्वेतकेश

सुबह सुबह ऋषिकेश की पावन भूमि पर पग धर चुके थे। अब भौंर का मन्द प्रकाश जैसे जैसे लालिमा लेता जा रहा था, हमारे डग गंगा घाट की और अग्रसर थे और निन्दियायी आँखों में गंगा की ताजगी के दर्शन की अभिलाषा आँखों को फाड़े डाल रही थी। कुछ ही पलों के उपरान्त हम गंगा में डुबकी लगा रहे थे। गंगा का वेग गंगा की महानता के गीत सुनाता हुआ नृत्य कर रहा था और हम उन सुरों को अपने आक्षेप से बेसुरा कर रहे थे। गंगा माँ से यह सहन न हुआ तो अपनी शीतलता हम पर उड़ेल दी और हम काँपते हुए किनारे पर आ बैठे।गंगा की महानता को निहारते हुए विचारों की नदी उफान मारने लगी। यदि देखा जाये तो यह जीवन भी एक नदी ही है। इसमें नाना प्रकार के विक्षेप बड़ी बड़ी लहरों के समान है। कालचक्र ही इनमें भँवरें बनकर उठता है। जन्म और मृत्यु ही इसके दो तट हैं तथा इसमें सुख-दुःख की छोटी छोटी तरंगें उठती रहती हैं। यौवन का उल्लास ही इसका कीचड़ है।वृद्धावस्था के श्वेत केश ही इसके धवल फेन हैं। व्यवहार ही इसके महाप्रवाह की रेखा है।इसमें नाना प्रकार के जड़रव(मूर्खों का कोलाहल)और जलरव( जल की ध्वनि ) हैं। राग-द्वेष रुपी बादल इसे बढ़ाते रहते हैं तथा भूतल पर इस...

शिव और शक्ति के यथार्थ स्वरूप का विवेचन

चेतनाकाश स्वरूप ब्रह्म को ही भैरव या रूद्र कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पंदन शक्ति है, उसे काली कहते हैं। वह शिव से भिन्न नही है। जैसे वायु व उसकी गतिशक्ति एक है, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता एक है, वैसे ही शिव और उसकी स्पंदनशक्ति-रूपा माया दोनों एक ही हैं।जैसे गतिशक्ति से वायु और उष्णताशक्ति से अग्नि ही लक्षित होती है वैसे ही अपनी स्पंदनशक्ति के द्वारा शिव का प्रतिपादन होता है।स्पन्दन या मायाशक्ति के द्वारा ही शिव लक्षित होते है, अन्यथा नही । शिव को ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्तस्वरूप शिव का वर्णन बड़े बड़े वाणी विशारद विद्वान भी नही कर सकते। मायामयी जो स्पंदनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिव की इच्छा कही गयी है। वह इच्छा इस दृश्याभासरूप जगत का उसी प्रकार विस्तार करती है, जैसे साकार पुरुष की इच्छा काल्पनिक जगत का विस्तार करती है। इस प्रकार शिव की इच्छा ही कार्य करती है। निराकार ब्रह्म शिव की वह मायामयी स्पंदनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत का निर्माण करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभास के द्वारा उद्दीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है।वही जीने की इच्छा वाले प्राणियों का ज...