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नव वर्ष का सही समय

क्या आपने दिल्ली की 26 जनवरी देखी है ?जिसमें सेना मार्च पास करती है।। मार्च क्या है ? कहीं मार्च कोई प्रारंभिक बिंदु तो नहीं है, जिसको पास करके मार्च पास किया जाता है? लगभग 3000 वर्ष पहले तो ऐसा ही था; जब मार्च प्रारंभ हुआ करता था किसी भी वर्ष का। केवल भारत भूमि पर ही नहीं बल्कि वैश्विक भूमि पर भी। तब सातवां महीना सितंबर था, आठवां महीना अक्टूबर था, नौवा महीना नवंबर था और दसवां महीना दिसंबर था। और 10 महीने का होता था वर्ष। लगभग सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में जैनों के नाम पर एक महीना जनवरी बढ़ा दिया गया। जैनो एक ग्रीस देवता का नाम है । इस को बढ़ाने का काम फेबरा नामक व्यक्ति ने किया था। फेबरा ने अपने नाम से भी फरवरी नामक एक और महीना बढ़ा दिया; और इस तरह से हो गए 12 महीने। लगभग 46 ईसापूर्व में जूलियस सीजर ने 1 महीने का नाम अपने नाम पर रख दिया। यह था जुलाई। सीजर के बाद ऑगस्टीन नाम के एक राजा ने अपने नाम पर उससे अगले महीने का नाम अगस्त रखा। सीजर एक राजा था और उस के नाम वाले जुलाई माह में 31 दिन थे तो ऑगस्टीन क्यों पीछे रहता ? उसने भी फरवरी से एक दिन निकाला और इस प्रकार अगस्त में भी 31 दिन हो...

ईश्वरीय सन्तुलन और आधुनिक विज्ञान

सर्व विदित है कि मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है। पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश। इनमें किसी भी तत्व की महत्ता को न्यूनाधिक की तराजू में नहीं तोला जा सकता।। सभी समान रूप से महत्वपूर्ण है। इन सबका एक संतुलित संगठन ही शरीर है। यह संतुलन जीवो को उम्र भर बनाकर रखना पड़ता है ।जब भी कभी संतुलन में असंतुलन उत्पन्न हुआ, तो समझो शरीर बीमारियों का घर बन गया। इसलिए समझदार मनुष्य सदैव इन पंचतत्वों को संतुलित बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्न शील रहते हैं। इन तत्वों का संतुलित संगठन ही सृष्टि है; और इनमें से किसी भी एक तत्व की अधिकता या न्यूनता ही विनाश है। हमारे अनुभव में प्रायः यह बातें आती रहती हैं। समुद्र तट पर जल प्रलय, पर्वतो में भूस्खलन, प्रायः जगह-जगह लग जाने वाली आग, वायु में प्रदूषण और अवकाश की कमी या अधिकता सभी कुछ जानलेवा है। इसलिए जरूरी है कि ना केवल हमें इन पंचतत्व का सही सही ज्ञान हो, अपितु इनके संतुलन को बनाए रखने के लिए भी ज्ञान और कर्मठता दोनों हों। हमारी सनातन परंपरा में इस बात को सृष्टि के आरंभ काल में ही समझ लिया गया था। तभी तो अग्नि विद्या का उद्घोष वेदों में उपलब्ध ह...

बीमारियों को ऐसे दूर रख सकते हैं

जैसे जैसे मनुष्य भौतिक सुख लोलुप होता जा रहा है, वैसे वैसे ही उसके जीवन में बीमारियों ने अपने तंबू नहीं, अपितु महल बना लिए हैं। आप अपने चारों तरफ से दृष्टि घुमाइए, कोई भी व्यक्ति आप को पूर्ण रुप से स्वस्थ नहीं मिलता। क्या सदियों से बीमारियां हमारे पीछे इसी प्रकार से पड़ी हुई है? नहीं!! जब मन शांत था,तमोगुण मनुष्य से दूर था, उस समय बीमारियां भी हम से दूर ही थी। किंतु जैसे जैसे हम सुविधाभोगी हुए, हमने अपने शरीर को नकारा बना डाला। खाली पड़े घरों में अक्सर कुत्तों का डेरा हो जाता है, वही हाल हमारे शरीर के साथ भी हो रहा है। हमारा मन, हमारा तन, सब कुछ भोग विलास में कमजोर हो चुका है। यही कारण है कि व्याधियां हमें हर ओर से घेरे हुए हैं। मनुष्य में जैसे-जैसे बुद्धि का विकास हुआ, उसने प्रकृति से बहुत कुछ सीखा है। सबसे बड़ी बात उसने मेहनत करके खाना सीखा है। किंतु जब से मनुष्य ने दूसरे के भोजन को छीन कर अपना भोजन मानना शुरू कर दिया है, तभी से मनुष्य के शरीर में बीमारियों ने अपना घर करना शुरू कर दिया है। क्या हम अपने आपको इन बीमारियों से, इन व्याधियों से, दूर कर सकते हैं? डॉक्टरों के पास इसका ...

सुनें अनहद नाद

ब्रह्मण्ड महाशून्य होते हुए भी पदार्थसमूहों से भरा हुआ है। पदार्थ है तो गति है।गति है तो घर्षण है।घर्षण है तो कम्पन्न है।कम्पन्न है तो आवाज है। विभिन्न अवर्त्तियों, गुणवत्ता और तीव्रताओं कि आवाज नाद कहलाती है। अनन्त ब्रह्मांड में नाद भी अनन्त हैं। कुछ मनुष्य को सुनाई देते हैं।कुछ मनुष्य की सुनने की क्षमता से नीचे से गुजर जाते हैं; और कुछ मनुष्य की सुनने की क्षमता से ऊपर से गुजर जाते है। इनमें से कुछ नादों को हम वैज्ञानिक विधि से पकड़ भी लेते है। विश्व मे कुछ ऐसे भी जन्तु हैं जो उन नादों को आसानी से पकड़ लेते है जिन्हें हमारी स्रोत इंद्रियां पकड़ नहीं पाती। इन्ही नादों में से कुछ नादों को बहुत सीमित मात्रा में लेकर हमारे पूर्वजों ने भाषा का निर्माण किया है।विभिन्न भाषाओं में विभिन्न नाद हैं। कुछ दूसरी भाषा के नादों से मेल भी खाते है और कुछ मेल नही भी खाते है। क्या आप कल्पना कर सकते है कि बिना पदार्थ के भी नाद उत्पन्न हो सकता है।नही कर सकते क्योंकि हमारी इन्द्रियों की पहुँच जहाँ तक होती है वहीं तक का हमें ज्ञान होता है।और कल्पना ज्ञान से बाहर तो जा नही सकती। किन्तु यदि हम इन्द्रियों से...

प्राचीन व महान कौन?अरस्तू या मनु ?

किसी भी देश के उत्थान में वहाँ की शिक्षा का अमूल्य योगदान होता है।भारत जैसा देश अपनी महान शैक्षिक परम्परा पर गर्व कर सकता है, किन्तु भारत में अपनी शिक्षा की उपेक्षा करके पाश्चात्य शिक्षा की नींव पर उत्थान के सपने देखना बड़ा हास्यस्पद है। नवीन खोजों के लिए हम प्रायः पाश्चात्य विद्वानों का अनुसरण करके ही आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। अपने विद्वानों पर से तो जैसे विश्वास ही उठ गया है।यही प्रेरणा हम अगली पीढ़ी को दे रहें हैं। किसी विषय के मूल को पढ़ाते हुए भी हम अपने विद्यार्थियों को अपने विद्वानों और उनके अनुसन्धान के विषय में बताना पसन्द नही करते।क्या अपनों का अनादर करके विकसित होने पर हम सन्तुष्टि का अनुभव कर सकते है? जीवविज्ञान में बचपन से हम जीवों के वर्गीकरण के विषय में पढ़ते थे। हमें कभी पता नही चला कि इस विषय में भारतीय मनीषियों का भी कोई योगदान है।आज भी आप विकिपीडिया उठाकर देख लीजिए किसी भारतीय का नाम उसमे नही मिलेगा । एक उदाहरण विकिपीडिया से नकल करके दे रहा हूँ-- ग्रीस के अनेक प्राचीन विद्वान, विशेषत: हिपॉक्रेटीज (Hippocrates, 46-377 ई. पू.) ने और डिमॉक्रिटस (Democritus, 465-370 ई...

दुःख , योग और हिन्दू

प्रायः ईश्वर की बनाई इस दृष्टि को दुःख का पर्याय माना जाता है। दुःख का कारण है अज्ञान,और इस अज्ञान को दूर करने के विभिन्न मार्ग दर्शन या शास्त्र के नाम से विख्यात हैं। मुख्यतः दुःख के तीन प्रकार के माने गये हैं-- 1)आधिभौतिक 2)आधिदैविक और 3)आधिदैहिक आधिभौतिक दुःख उन्हें कहा जाता है जिनका कारण भौतिक अथवा प्राकृतिक हो। जैसे भीषण गर्मी या भयंकर ठण्ड पड़ना, अतिवृष्टि व बाढ़ में सब कुछ तबाह हो जाना, भूकम्प में सब प्रकार की सम्पत्ति का नष्ट हो जाना, सुनामी आना, बादल फटना आदि आदि। इन आपदाओं को दृढ़ मन से सहन ही करना पड़ता है इसके अतिरिक्त कोई उपाय नही होता। आधिदैविक दुःख में हमारे मन बुद्धि और अहंकार को चोट पहुँचती है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, आसक्ति,आशा, तृष्णा आदि इस दुःख के कारण है; और इन सब का मूल अज्ञान है। तीसरा है आधिदैहिक दुःख; शरीर में चोट लगना, फोड़े फुंसी होना, ज्वर आना, एलर्जी होना अर्थात किसी भी प्रकार के शारीरिक रोग। आधिदैहिक दुःख से छुटकारा पाने के लिए हम प्रायः किसी डॉक्टर ,वैध या हकीम के पास दौड़ते हैं। अब प्रश्न यह है कि इन दुःखों के मूल कारण अज्ञान को क्या हम दूर करने का प...

वस्त्र और वैराग्य

भारत में वेदों पर आस्था रखने वाले आस्तिक दार्शनिक विचारधाराएं हों या जैन, बौद्ध और चार्वाक जैसी नास्तिक विचारधाराएं हो;सभी में जीवन के साथ साथ मृत्यु और मृत्यु के उपरांत, दोनों स्थितियों को अपने अपने चश्मे से देखा है तथा मानव का परमशुभ जीवन से परे मृत्यु के उपरांत ही खोजा है।किन्तु उस परमशुभ तक पहुँचने के लिए प्रयत्न सभी जीवन में ही करने है। सबसे पहला प्रयत्न है मन का अनासक्त होना और जीवन में वैराग्य होना। किन्तु वैराग्य को सनातनी महापुरुषों ने कर्तव्य के साथ जोड़ा है और नास्तिक दर्शनकारों ने कर्तव्यच्युत होने को ही वैराग्य समझा है। शायद यही कारण है कि सनातनी राजा हरिश्चंद्र हो, जनक हो, राम हो या महायोगी श्रीकृष्ण हो; ये लोग अपने सनातनी कर्तव्यों से कभी नही भागे अपितु गृहस्थ होते हुए भी सन्यासी का जीवन जिया । किन्तु बुद्ध और महावीर ने वैराग्य मि ज्वाला मन में जलते ही सर्वप्रथम गृहत्याग किया । सम्भवतः सुपात्र व्यक्तियों को योग्य गुरु न मिलने के कारण ऐसा हुआ। वेदों से दूरी भी इनके भटकाव का कारण बनी। किन्तु कहते है कि लक्ष्य वही पता है जो घर से निकलता है। घर में पड़े हुए व्यक्ति को लक्ष...

धर्म का अध्ययन क्यों ?

बाबा रामदेव की सभा लगी थी। उसमें एक MBBS किये हुए डॉक्टर बैठे थे। अतीत में बाबा के कटु आलोचक थे। समझदार थे। उन्होंने निश्चय किया कि योग और आयुर्वेद की आलोचना के लिए पहले उनके बारे में जाने और प्रयोग करें। अतः एक रोज वें बाबा के योग शिविर में जा पहुँचे। योग सीखा और अपनी प्रैक्टिस में आने वाले मरीजों को भी कुछ आसान के लिए प्रेरित करने लगे। योग के सकारात्मक परिणाम ने उनकी मनोदशा को भी बदलकर रख दिया और अब वें योगशिक्षक के रूप में निशुल्क सेवा कर रहे हैं। कुछ ऐसा ही होता है उन लोगों के साथ भी; जो हिन्दू धर्म की आलोचना करने के लिए वेदों और उपनिषदों का अध्ययन करने लगते है और सत्मार्ग को पहचान कर उस पर चलकर अपना उद्धार कर लेते हैं। कुछ लोग भोग के वश में होकर भोग सामग्रियों के लिए ही शास्त्र के अभ्यास में लग जाते है और परम् पद प्राप्त कर लेते हैं।शास्त्रों में निपुण योग्य गुरु का निरन्तर श्रवण या शास्त्रों का नियमित अध्ययन मनुष्य को सच में मनुष्य बना देते हैं। इसलिए आजकल के पढ़ेलिखे समाज में मनुष्य को चाहिए कि धूर्त के व्यख्यान सुनने की अपेक्षा स्वयं अपने धर्मग्रन्थों यथा भागवत गीता, रामायण, ...

नदी में फेन नही ,वृद्धावस्था के श्वेतकेश

सुबह सुबह ऋषिकेश की पावन भूमि पर पग धर चुके थे। अब भौंर का मन्द प्रकाश जैसे जैसे लालिमा लेता जा रहा था, हमारे डग गंगा घाट की और अग्रसर थे और निन्दियायी आँखों में गंगा की ताजगी के दर्शन की अभिलाषा आँखों को फाड़े डाल रही थी। कुछ ही पलों के उपरान्त हम गंगा में डुबकी लगा रहे थे। गंगा का वेग गंगा की महानता के गीत सुनाता हुआ नृत्य कर रहा था और हम उन सुरों को अपने आक्षेप से बेसुरा कर रहे थे। गंगा माँ से यह सहन न हुआ तो अपनी शीतलता हम पर उड़ेल दी और हम काँपते हुए किनारे पर आ बैठे।गंगा की महानता को निहारते हुए विचारों की नदी उफान मारने लगी। यदि देखा जाये तो यह जीवन भी एक नदी ही है। इसमें नाना प्रकार के विक्षेप बड़ी बड़ी लहरों के समान है। कालचक्र ही इनमें भँवरें बनकर उठता है। जन्म और मृत्यु ही इसके दो तट हैं तथा इसमें सुख-दुःख की छोटी छोटी तरंगें उठती रहती हैं। यौवन का उल्लास ही इसका कीचड़ है।वृद्धावस्था के श्वेत केश ही इसके धवल फेन हैं। व्यवहार ही इसके महाप्रवाह की रेखा है।इसमें नाना प्रकार के जड़रव(मूर्खों का कोलाहल)और जलरव( जल की ध्वनि ) हैं। राग-द्वेष रुपी बादल इसे बढ़ाते रहते हैं तथा भूतल पर इस...

शिव और शक्ति के यथार्थ स्वरूप का विवेचन

चेतनाकाश स्वरूप ब्रह्म को ही भैरव या रूद्र कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पंदन शक्ति है, उसे काली कहते हैं। वह शिव से भिन्न नही है। जैसे वायु व उसकी गतिशक्ति एक है, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता एक है, वैसे ही शिव और उसकी स्पंदनशक्ति-रूपा माया दोनों एक ही हैं।जैसे गतिशक्ति से वायु और उष्णताशक्ति से अग्नि ही लक्षित होती है वैसे ही अपनी स्पंदनशक्ति के द्वारा शिव का प्रतिपादन होता है।स्पन्दन या मायाशक्ति के द्वारा ही शिव लक्षित होते है, अन्यथा नही । शिव को ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्तस्वरूप शिव का वर्णन बड़े बड़े वाणी विशारद विद्वान भी नही कर सकते। मायामयी जो स्पंदनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिव की इच्छा कही गयी है। वह इच्छा इस दृश्याभासरूप जगत का उसी प्रकार विस्तार करती है, जैसे साकार पुरुष की इच्छा काल्पनिक जगत का विस्तार करती है। इस प्रकार शिव की इच्छा ही कार्य करती है। निराकार ब्रह्म शिव की वह मायामयी स्पंदनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत का निर्माण करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभास के द्वारा उद्दीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है।वही जीने की इच्छा वाले प्राणियों का ज...

रूद्र के स्वरूप की पड़ताल

भगवान शिव का रूद्र नामक भयंकर रूप क्यों है? क्यों उनका रँग काला है? उनके पाँच मुख कौन कौन और कैसे है?उनकी दस भुजाओं का रहस्य क्या है? उनके तीन नेत्र कौन कौन से है? और उनके त्रिशूल का क्या अर्थ है? प्रतीकों में रमण करने वाले हिन्दुओं!क्या कभी इन प्रश्नों पर विचार किया है? तथाकथित पढ़े-लिखे लोग इस मूर्तियों को देखकर हँसते है। उनके हँसने का कारण भगवान शिव का वह स्वरूप ही नही है अपितु हमारे द्वारा उस स्वरूप को भगवान मान लेना है। हम उस प्रतीक में ही खुश है। उस मूर्ति के मुँह में लड्डू ठूँसकर भगवान की पूजा करके सन्तुष्ट हैं। न तो हम भगवान को जानने का प्रयास करते हैं और न हँसने वाले मूर्खों की जिज्ञासा शान्त कर सकते है। यही कारण है कि अपने धर्म से अनभिज्ञ हिन्दू धर्म से ही पलायन कर रहे हैं। दूसरे धर्म में व्याप्त पर्याप्त वासना उन्हें आकर्षित कर रही है। अतः विद्वपुरुषों ! अपने धर्म के मर्म को समझो और अन्य को भी समझाओ। हमने इसके लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। आपसे अनुरोध है कि उसको प्रचारित करें। उपनिषदों के एक एक श्लोक को संक्षिप्त व्याख्या के साथ हम u tube पर भी हैं और इस ब्लॉग पर तो ह...

चित्त का निरोध क्यों?

योग दर्शन के प्रारंभ में दूसरा सूत्र स्पष्ट घोषणा करता है की "योगस्य चित्तवृत्ति निरोध" अर्थात योग से चित्त में उत्पन्न होने वाली या चित्त की वृत्तियों की रोकथाम होती है। क्यों मनुष्य चित्त की वृत्तियों को रोकने के लिए इतना कठिन परिश्रम करता है? आखिर इन वृत्तियों में क्या है जो मनुष्य को इनसे दूर जाने के लिए प्रेरित करता है? महर्षि श्री वशिष्ठ जी अद्वैत के प्रतिपादक योग-वशिष्ठ के निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध में इन प्रश्नों को कुछ इस प्रकार हल करते हैं--- सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा को सृष्टि रचने की इच्छा उत्पन्न होती है।तदन्तर पूर्वकाल की जगतवासनाओं का जगद्रूप में उद्भव होता है।इसलिए वासना की शांति को निर्वाण समझना चाहिए और वासना की सत्ता को ही संसाररूपी भ्रम समझना चाहिए।चित्त की वृत्ति को जगाकर बहिर्मुख कर देने से बन्धन होता है और उसे परमात्मा में लीन क्र देने पर निर्वाण प्राप्त होता है।चित्तवृत्ति का जागरण ही संसार रूपी शिशु को उत्पन्न करने वाला गर्भाशय है।उससे उत्पन्न हुआ यह जगत असत होते हुए भी सत के समान भासित होता है।चित्त के संकल्प का जाग्रत होना ही बन्धन बताया गया ...

दिव्य दृष्टि मुझमें है

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण के विराटरूप से शायद ही कोई हिन्दू अपरिचित हो!किन्तु जो दिव्यदृष्टि उस समय अर्जुन और संजय को प्राप्त थी क्या वह अब भी किसी को प्राप्त हो सकती है? अधिकतर लोग कदाचित ना में ही उत्तर दें क्योंकि आज का सनातनी हिन्दू अपने वास्तविक धर्म से बहुत दूर है।धन कमाने और बढ़ाने की होड़ में धर्म के विषय में सदैव दूसरों का बिना सोचे समझे अनुसरण कर रहा है। कोई धर्म की कैसी भी व्याख्या कर दे उसे आँख बंद करके मान लेते हैं। उन धन कमाने वाले अंधो का कोई भी चतुर व्यक्ति लाभ उठा लेता है और भगवान के नाम पर लूटने लगता है। लोग प्रसन्नतापूर्वक लुट कर आते हैं और लूटने वाले को भगवान बना देते हैं। ईश्वर को समझने जाने का उनका उद्देश्य तो अच्छा होता है किंतु इस खोज में व्यक्तिपूजा में संलग्न हो जाते हैं । ऐसे लोगों को ईशोपनिषद ने "अंधम तमः प्रविशन्ति" कहा है अर्थात अज्ञान के अंधे कुएं में प्रवेश करने वाले। हमारा धर्म समृद्ध साहित्य से भरपूर है। इस साहित्य का अध्ययन मनन और निदिध्यासन करके अपने जीवन में आलोक भरना ही ईश्वर पूजा है। जो ईश्वर विराट है उसे एक तुच्छ मानव चोला ध...

अभ्यास की महिमा

यह अभ्यास का विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है! अभ्यास से अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी पूर्ण हो जाता है, और बाण अपने महान लक्ष्य को भी भेद डालता है। देखिए, यह अभ्यास की प्रबलता कैसी है? अभ्यास से कटु पदार्थ भी मन को प्रिय लगने लगता है--- अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्यास से ही किसी को नीम अच्छा लगता है और किसी को मधु। निकट रहने का अभ्यास होने पर जो भाई बंधु नहीं है, वह भी भाई बंधु बन जाता है और दूर रहने के कारण बारंबार मिलने का अभ्यास न होने से भाई बंधुओं का स्नेह भी घट जाता है। भावना के अभ्यास से ही यह अतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणा के अभ्यास की भावना से पक्षियों के समान आकाश में उड़ने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिए, अभ्यास की कैसी महिमा है? निरंतर अभ्यास करने से दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने ईष्ट वस्तु के लिए अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्यों में अधम है। वह कभी उस वस्तु को नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वंध्या स्त्री अपने गर्भ से पुत्र नह...

दुर्गा भाभी

आज हमें हमारा अहं यह स्वीकारने ही नही देता कि जो आज हम हैं उसमें हमारा ही योगदान नही है अपितु लाखों करोड़ों पूर्वजों का भी सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार का योगदान जुड़ा है। हम 'मैं' में तो परिवर्तित हो ही नही सकता। जब जब ऐसा करने का प्रयत्न हुआ हमने अपने विनाश की ही नींव रखी। अहंकार रावण का रहा हो या कंस का, हिरण्यकश्यप का रहा हो या दुर्योधन का ; परिणाम विनाश में ही सामने आया है। क्या हम इस बात को नकार सकते है कि हमारे आज की स्थिति के अस्तित्व में हमारी स्वतन्त्रता की भी भूमिका है?क्या हमारे जीवन में स्वतंत्रता की बलि वेदी पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों और वीरांगनाओं की कोई छवि नही है? सच तो यह है कि हम आज दुःखो के आतप से बचने के लिए जिस वटवृक्ष की शीतल छाया का उपभोग कर रहे है वह उन वीरों और वीरांगनाओ के तनों शाखाओं और पत्तियों से ही आच्छादित है। इस छाया का आनन्द लेते समय हमें उस आतप का सदा स्मरण रखना चाहिए जो हमारे लिए हमारे पूर्वजों ने हमें सुख देने के स्वप्न देखते हुए स्वयं के ऊपर सही ।वह दर्द हमारे लिए सहा गया इसलिए उस दर्द पर हमारा भी कुछ तो अधिकार है। उनके...

वाल्मीकिजी डाकू थे?

वो रत्नाकर थे या नही, आस्था की बात है किन्तु उन्होंने हमें रामायण जैसा महान ग्रन्थ रुपी रत्न प्रदान कर रत्नाकर अवश्य बना दिया। रामायण मात्र कथा नही है अपितु मर्यादा, कर्तव्य, निष्ठा, आस्था और प्रेम आदि का प्रतिमान है। इन शब्दों को अर्थ प्रदान करने वाले महान और आदि कवि महाऋषि वाल्मीकि को सतत एवं कोटि कोटि वन्दन। हमारे देश में विरोधियों को भी सम्मान देने की महान परम्परा है जिसका लाभ प्रायः ऐसे लोग उठाते हैं और हमारा भोलापन देखिये कि हम उनकी बातों को सत्य भी मान बैठते है। हो सकता है इसका कारण हजारों वर्षों की दासता हो जो जी हुजूरी की परंपरा में हमारे रक्त में शामिल हो गई है।जिसने जैसा कहा हमने सर झुका कर मान लिया। और अपनी पीढ़ियों को अपनी दासता की विवशता न बता पाने के कारण उस झूठ की मान्यता को सत्य दिखाने के प्रयत्न में तरह तरह की कहानियाँ गढ़ ली। क्योंकि हमारी साहित्यिक परम्परा में पात्रों के नाम भी उनके चरित्र से मेल खाते हैं। हम दुर्योधन व दुशासन को सुयोधन व सुशासन नाम से नही जानते।फिर रत्नाकर को डाकू कैसे कहा जा सकता है। आज हिन्दू धर्म पर शोध की नही अपितु शोधों की आवश्यकता है ताकि सभी...

श्राद्ध

प्राचीन काल में इस पर मंथन नही किया गया था। कदाचित उस समय के जनसमुदाय जिस विचारधारा में जी रहे थे उसमें ऐसे चिन्तन का कोई ओचित्य भी नही था। मानव मानवों से अधिक ऋणी तो प्रकृति का था या यूँ कहें कि समझता था।यद्यपि 'समझता था' आज के परिप्रेक्ष में है। उस समय के परिप्रेक्ष में तो 'था' ही उचित है। इसलिए वह सदैव प्रकृति से उऋण होने के उपाय पर ही चिन्तन करता था। प्रारम्भिक ऋग्वेद तो इसी और संकेत करता है। वृक्षों, नदियों, तालाबों, वायु, अग्नि, धरती, आकाश आदि के ऋण से मुक्ति पाना मोक्ष था।इसीलिए उन सब को देवत्व प्राप्त था तथा उनका स्तुतिगान मानव का परमकर्तव्य था। धीरे धीरे मानव प्रकृति से ऊपर उठकर प्रकृति नियंता की आराधना करने लगा । वह लगातार अपने चिन्तन का विकास कर रहा था और जीवन में सुख, समृद्धि और समरसता लाने के लिए एक परमशुभ की खोज में था। वह उसे जाकर मिला उपनिषद काल में। जब एक ब्रह्म और अद्वैत की चरम सीमा पर मानव पहुँच गया। मानव की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि जब वह निकृष्ट के सम्पर्क में रहता है तो उत्कृष्ट की आकांक्षा रखता है और जब उत्कृष्ट की प्राप्ति हो जाती है तो उसे संभ...

RTI लगाने का तरीका

_RTI_ लगाने का तरीका* 👉🏿RTI मलतब है सूचना का अधिकार - ये कानून हमारे देश में 2005 में लागू हुआ। जिसका उपयोग करके आप सरकार और किसी भी विभाग से सूचना मांग सकते है। आमतौर पर लोगो को इतना ही पता होता है। परंतु आज मैं आप को इस के बारे में कुछ और रोचक जानकारी देता हूँ - 👉🏿RTI से आप सरकार से कोई भी सवाल पूछकर सूचना ले सकते है। 👉🏿RTI से आप सरकार के किसी भी दस्तावेज़ की जांच कर सकते है। 👉🏿RTI से आप दस्तावेज़ की प्रमाणित कापी ले सकते है। 👉🏿RTI से आप सरकारी कामकाज में इस्तेमाल सामग्री का नमूना ले सकते है। 👉🏿RTI से आप किसी भी कामकाज का निरीक्षण कर सकते हैं। 👉🏿RTI में कौन- कौन सी धारा हमारे काम की है। 👉🏿धारा 6 (1) - RTI का आवेदन लिखने का धारा है। 👉🏿धारा 6 (3) - अगर आपका आवेदन गलत विभाग में चला गया है। तो वह विभाग इस को 6 (3) धारा के अंतर्गत सही विभाग मे 5 दिन के अंदर भेज देगा। 👉🏿धारा 7(5) - इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नही देना होता। 👉🏿धारा 7 (6) - इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन में नहीं आता है तो सूचना निशुल्क में दी जाएग...

बिजली, फिल्म और शौचालय

बिजली की आँख मिचौली में, रविवार की फिल्म का, किरकिरा होता मजा; किन्तु शोंक का करें क्या?? दो ही शोंक थे बालपन के, खेलना, बेसब्री से रविवार की बाट जोहना; शनिवार की साप्ताहिकी के बाद, रविवार की हिन्दी फ़ीचर फिल्म के लिए, फूलों सजी राहों में पलके बिछाना; किन्तु बिजली???? फिल्म का पहला गीत आया नही कि गुल; दौड़ते खेल के मैदान की और, मन्द मन्द परिहास से मुँह चिढ़ाता चाँद, कि अचानक जलते बल्ब, और गाँव में उठता बच्चों का सुख क्रन्दन; पाँव धरा को न छूते, सब की दौड़ की एक ही मंजिल, वह घर जहाँ शादी में आया था नया टी वी; बिजली आने पर फिल्म का कोई भाग छूट न जाये; उधर मार्ग में कतारबद्ध बैठी महिलाएँ, एक पल के लिए खड़ी होती मुँह फिराकर, कि अस्मत न जाये बह , चाँद के मन्दम आलोक की नदी में, नाक को नाहक मिलती सजा की कहाँ थी फ़िक्र? मन तो फिल्म की कथा पर होता, खलनायक की पिटाई पर; तब सचमुच बच्चे थे , हाँ बच्चे ही; शुलभ शौचालय की खोज तो हो चुकी थी; किन्तु जाग्रति न थी। घर में शौचालय सुलभ कराने से, मार्ग के किनारे विकल्प सुलभ था, किन्तु चाँद का मन्दम परिहास, हम पर नही था लक्षित, इ...

जिह्वा पर ताला

मेरी चुप्पी में मेरी जिह्वा का सार है, नाशवान है जगत ,सङ्ग ही असार है। पतली अनन्त परतों में छिपा कर के ज्ञान को, माया समझी है कि अब उसकी ही सरकार है।। एक समंदर में बना कोई पिंड बर्फ का, साँस भरे तो कहे कि जल उसका आहार है। वह स्वयं जल नही, जलसे अलग है सर्वथा, मूर्ख ना माने यह कि जल ही सृष्टिसार है। मैं भी क्या नही हूँ वैसा ही पिंड एक, भ्रम जगतजाल है, सत्य पर वार है।। कैसे शल्य करे वह असत पर सत्य की? चिकित्सक ही भ्रमरोग से पड़ा बीमार है। यदि खोल भी दूँ जिह्वा पर लटका ताला, सुनेगा कौन?जन जन में माया की रसधार है। हूँ सनातन किन्तु, प्रयत्न रहेगा सदा; कर्तव्य पालन पर तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।।

हिन्दी दिवस नहीं, अंग्रेजी निषेध दिवस

सितम्बर माह हिन्दी भाषा के लिए चिन्तित रहने वाले लोगों के लिए एक आशा किरण लेकर आता है। हिन्दी के प्रसार और विकास के नए नए संदर्श प्रस्तुत किये जाते हैं।मीडिया की भूमिका पर बहस होती है। साहित्यक जगत के लोगों की व्यस्तताएं चरम पर होती है। सब हिन्दी को जनमानस से जोड़ने की जुगत में लग जाते हैं। सितम्बर गया नही कि पुनः अंग्रेजी देवी की अर्चना आरम्भ हो जाती है। केवल हिन्दी के लिए ही विशेष पखवाड़ा और दिवस क्यों? क्या अन्य भारतीय भाषाओं को विकास और प्रसार का अधिकार नही है? संस्कृत की जीवित बहन भाषा तमिल है। त्रेता युग में वनगमन के समय श्री राम ने महाऋषि अगस्त से तमिल भाषा की शिक्षा प्राप्त की थी। इस भाषा के प्रसार के लिए हमारे बुद्धिजीवी, तंत्र और सरकार क्या कर रहें है? अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के 70 वर्ष बाद भी हम अंग्रेजी की दासता से मुक्त क्यों नही हो सके हैं? विज्ञान वर्ग से सम्बंधित पाठ्यक्रम पूरे देश में प्रायः अंग्रेजी में ही पढ़ाया जाता है। 70 वर्षों में क्या हम इस योग्य भी नही हो सके हैं कि ज्ञान-विज्ञान की नई जानकारियों को अपनी भाषा में अनुवादित करके अपने बच्चों को उनकी मातृभाषा ...

गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस

5 सितंबर के दिन पूरे देश में शिक्षक दिवस की बधाइयाँ गूँज रही थी। सारा सोशल मीडिया डॉ. राधाकृष्णन जी के फोटो और संदेशों से भरा हुआ था। प्रत्येक देशवासी गर्व के क्षणों में गोता लगा रहा था। डॉ.राधाकृष्णन जी के विचारों को जहाँ-तहाँ तरह तरह से उल्लेख किया जा रहा था। डा. राधाकृष्णन माँ भारती के महान सपूतो में से एक हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति और दर्शन को उस दौर में विश्व के लोगों तक पहुँचाया जब हिन्दू स्वयं को हिन्दू बताने में शर्म का अनुभव किया करता था। हिन्दू 1000 वर्षों की दासता के बोझ तले इतना दब चुका था कि उस मानसिकता से निकलने की चाहत ही पूर्णतः खो चुकी थी। ऐसे में हिन्दू समाज की अवैदिक रूढ़ियों के विरुद्ध देश में ऋषि दयानन्द और राजा राम मोहन राय जैसे महापुरुषों ने संग्राम छेड़ दिया तो वेदों की सच्चाइयों को विवेकानन्द जी और राधाकृष्ण जी के द्वारा आंग्लभाषा में दूर देशों तक पहुँचाया। इसलिए अन्य महापुरुषों के संग डॉ. राधाकृष्णन आदरणीय है किन्तु उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के ओचित्य पर संशय है। क्या उनसे पहले भारतीय इतिहास में शिक्षक नही हुए ? परशुराम, गुरु द्रोण , गु...

भारत में जीरो और आर्यभट्ट

पिछले कुछ दिनों से कुछ अज्ञानियों द्वारा ज़ीरो और आर्यभट्ट पर बहुत कॉमेंट नजरों में आ रहे हैं। तो हमने सोचा कि क्यों न इस सत्य पर पड़े अज्ञानता के आवरण को सरका दिया जाये जिससे एक बार फिर सत्य का प्रकाश आपके ज्ञान को अपडेट करे। तो पहले बात करते है शून्य के खोज के इतिहास की। इस कहानी में राजा महाराजा नही हैं। इसमें मुनि व मनीषी भी नही हैं। इसमें है साधारण लोग जिन्हें आजकल आम लोग कहा जाता है। वे लोग जो आग जलाना सीख चुके हैं। पहिये से अपने श्रम की बचत करना भी सीख चुके हैं। खेती करना सीख चुके हैं। पशु पालना सीख चुके हैं। और उन पशुओं की गणना करना भी कुछ हद तक सीख चुके हैं।जमीन के एक टुकड़े को चारों और से लक्कडों तथा झाड़ियों आदि से घेरकर उनमें अपने पशुओं की सुरक्षा करना सीख चुके है। काम में एक दूसरे का हाथ बंटाना सीख चुके हैं। इसके लिए समय को टुकड़ो में तोडना भी उन्होंने जान लिया है। वे घड़े में रेत भरकर उसके नीचे छेद करके रेत के रित जाने को एक घट और दिनरात 24 घट में बाँट चुके है। अब उन्होंने रेत के स्थान पर जल लेकर समय के और छोटे भाग बना डाले हैं। घड़े के रीतने को 60 भागों में विभक्त कर चुके है...

स्वतन्त्र, सर्वश्रेष्ठ , हिन्दू

भारत मनीषियों का देश रहा है किंतु मनीषियों की सैंकड़ो पीढ़ियाँ सहस्त्राब्दि की दासता झेलने के बाद राजनैतिक रूप से स्वतंत्र अवश्य हो गयी है किन्तु स्वतंत्र मनन करने की क्षमता उनमें न जाने कब आएगी? मनन की अपेक्षा रट रट कर और नकल करके परीक्षा में सफल होने हो उद्यत यह पीढ़ी न जाने कब अपने सच्चे स्वरूप को पहचानेंगी? हम ऋषियों की संतान है, हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और महायोगी श्री कृष्ण के वंशज हैं, हमारी नस नस में गतिमान रक्त हमारे प्रबुद्ध पुर्वजों की बुद्धिमत्ता और विश्व को सत्यता के अन्वेषकों और विचारकों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की और बहता प्रवाह ही है। हम भी वही है किंतु अपने स्वरूप को भुला बैठे हैं और उन लोगों के पीछे रेल के डिब्बों की तरह दौड़ रहे है जिन्हें ज्ञान का ककहरा हमने सिखाया है।(पश्चिमी देशों के पीछे) अन्य सम्प्रदायों की बात करें तो वें किसी एक व्यक्ति द्वारा चलाये गये सम्प्रदाय हैं और उनके अनुयायियों को केवल उनकी बातों का अनुसरण करना ही सिखाया जाता है ताकि वे अपनी बुद्धि का प्रयोग न कर सके और और सम्प्रदाय के चलाने वाले को ही भगवान की तरह पूजते रहे। ये सम्प्रदाय हमारे च...

चरखा और नवयुवक

आजकल चरखा लोगों का एक बड़ा दुश्मन बनकर उभर रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में चरखे के योगदान को नकार कर पिस्तौल को महिमामण्डित करना नवयुवकों की दिवानगी हो गयी है। हिन्दू बनना उनका शोंक बन गया है और चरखा हिन्दू होने पर कलंक जैसा हो गया है। इन मूढ़ बालकों को कैसे समझाया जाये कि चरखा हमारी दुर्बलता नही अपितु शक्ति थी, है और रहेगी। चरखा भले हो नई पीढ़ी के लिए गुजरे समय की बात हो जाये किंतु चरखा हमारी शक्ति अवश्य बना रहेगा। यह पढ़कर कुछ लोग मुझे मूर्ख समझने की भूल कर सकते हैं। मैं किसी के सोचने के निजी अधिकारों में टांग तो अड़ा नही सकता,जो यह भूल करते हैं करे! किन्तु जब हम अपने धर्म के मूल को खोकर उदाहरण स्वरूप कही गयी कहानियों और प्रतीकों में ही भटककर भी धार्मिक हो सकते है तो चरखे को कोसने से देशभक्त भी हो सकते है। यह सामान्य सी भूल हमारी संस्कृति के लिए कितनी घातक हो सकती है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो नग्नता हम अजंता, एलोरा के समय से त्याग कर सभ्यता के आवरण में ढाँक चुके थे उसे केवल इसलिए उतार फेंक रहे है कि एक बाहरी संस्कृति ने हमे बताया कि इससे आधुनिक बना जाता है। अभी...

स्वभाव:गुणों का असन्तुलन

गीता में कहा गया है कि प्रकृति तीन गुणों सत्व, रजस और तामस का संतुलन मात्र है। इन गुणों में हलचल के परिणामस्वरूप हमे भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। यें तीन गुण ही मानव के स्वभाव को निर्धारित करते हैं। इन गुणों पर नियंत्रण करके जो मनुष्य समाज के भले के लिए चिन्तन करता हुआ व्यवहार करता है वह सत्वगुणी होता है ,जो केवल अपने लिए कर्म करता है वः रजोगुणी तथा जो समाज के विपरीत कर्म करता है वह तमोगुणी होता है। ऐसे में प्रश्न यह उतपन्न होता है कि समाज का भला कैसे हो सकता है? किस प्रकार का चिंतन समाज को उच्चआदर्शों पर ले जा सकता है? जब तक उच्चादर्श का पता नही होगा तब तक समाजहित में न तो चिंतन सम्भव है और न कर्म ।ऐसे में हम किस गुण के पोषक हैं? स्वभाव का सन्तुलित गुण तो रजोगुण ही है। इसमें व्यक्ति केवल अपनी भौतिक इच्छाओं को पूर्ण करने में ही जीवन बिता देता है। इनके कर्मों को हम नैसर्गिक कर्म कह सकते है। ये कर्म वास्तव में चिन्तनरहित होते है। किन्तु तमोगुणी और सतोगुणी होना मनुष्य के ज्ञान पर आश्रित होता है। यदि यह ज्ञान व्यक्ति के स्वार्थों को पूर्ण करने तक सीमित हो तो कर्म तमोगुणी हो जाते है और यद...

शिवजी की भांग का रहस्य

एक बार एक मंदिर में भजन संध्या चल रही थी और उसमें एक गायक झूम झूम का गा रहा था... गोरा जी ने बो दी हरी हरी मेहँदी शिव जी ने बो देइ भांग ... पी के भांग भोला मारे झटके, भोला न्यू मटके भोला न्यू मटके। ये भजन तो मुझे किसी भी कोण से नही लग रहे थे। तेज संगीत की धुन पर भाँडो को नाच के नाम पर कूदने को मिल रहा था और भंगड़ो को भांग भरी चिलम मिल रही थी। मैं सोचने पर विवश हुआ कि यें शिव का महिमामंडन कर रहे है या चरित्रहनन? आखिर ऐसा क्या है कि शिवजी को इतना बड़ा व्यसनी के रूप में मंडित किया गया। क्या शिव वास्तव में भांग पीते थे? ऐसा नही था। वास्तव में वे भगवतभक्ति में चरम सीमा तक डूबे थे। मानव तन में प्रकट हुए थे तो मानव के सम्मुख स्वयं को आदर्श के रूप में रखने को भोलेनाथ ने तप का मार्ग चुना था और ब्रह्म प्राप्ति में मग्न रहते थे। योग वशिष्ठ में कहा गया है कि शास्त्र और सज्जनों की संगति से अपनी बुद्धि को शुद्ध और तीक्ष्ण करना चाहिए। यही योगी के योग की पहली भूमिका है। इसका नाम 'श्रवण' भूमिका है। ब्रह्म के स्वरूप का निरंतर चिन्तन करना 'मनन' नामक दूसरी भूमिका है। संसार के संग ...

महान संकल्पी भीष्म

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥ भावार्थ : भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है॥10॥ अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ भावार्थ : इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें॥11॥ दुराचारी भी सदाचारी के समर्थन पर ही उछलता है।अन्यथा दुर्योधन युद्धभूमि में मामा शकुनी की सुरक्षा पहले करता किन्तु वह ऐसा नही करता क्योंकि वह जानता है कि भीष्म दृढ संकल्पी है अतः उनकी सुरक्षा सर्वोपरि है। भीष्म का संकल्प जीवन भर किसी भी आतप से टूट न सका था। जीवन में कितने दबाव और झंझावात आये किन्तु भीष्म को न तोड़ सके। अम्बा जैसी सुंदर राजकुमारी भीष्म के संकल्प को तुड़वाने के लिए सभी तरह के दबाव बनाने में सफल रही। उसने राजा विचित्रवीर्य से गुहार लगाई, गुरुश्रेष्ठ परशुराम से गुहार लगाई किन्तु गुरु जिनकी इच्छामात्र भीष्म के लिए आदेश से कम न थी उनका दबाव भी भीष्म को प्रभा...

गीता का प्रथम रहस्य

गीता एक ऐसी पुस्तक है जिस पर विश्व में सबसे अधिक टिप्पणियां की गयी, सबसे अधिक भाष्य लिखे गए और सबसे अधिक लोगों के द्वारा गीता से मार्गदर्शन प्राप्त किया गया व प्रेरणा ली गई।आधुनिक समय के लगभग सभी मनीषियों ने गीता पर टिप्पणी की है। किन्तु ज्ञान के भण्डार 18 अध्यायों में से प्रथम अध्याय को मात्र परिचय के रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा इस पर किसी भी मनीषी ने अधिक व्याख्या नही की है। क्या गीता जैसी ज्ञान से भरी पुस्तक में ऐसा सम्भव है कि एक अध्याय मात्र प्रसङ्ग बताने में ही खो जाए ? मुझे लगता है इसमें शोध की आवश्यकता है। महात्मा गाँधी जी ने अवश्य प्रथम अध्याय को समझने का प्रयास किया है,किन्तु उन्होंने गीता के अलग अलग श्लोक की व्याख्या न करके पूरे पूरे अध्यायों का सार प्रस्तुत किया है वह भी पत्र शैली में।किन्तु उनके प्रथम श्लोक की व्याख्या निश्चित ही प्रेरणास्पद है । धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ भावार्थ : धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या कि...

रक्षासूत्र और रक्षा की शपथ

रक्षाबन्धन का पर्व बड़े प्रेम और उल्लास से भारत सहित दुनिया भर के हिंदुओं में मनाया गया। बहनों ने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र के रूप में रंग बिरंगी राखियाँ बाँधी और माथे पर मंगल टीका लगाया था बदले में भाइयों ने बहनों को आर्थिक नेग के साथ साथ जीवन भर सुरक्षा का वचन दोहराया। यह परम्परा हमारे धर्म में अत्यंत प्राचीन है। उत्तरी ध्रुव से जब आर्य एशिया की और अपने कुरुप्रदेश को सरका रहे थे तभी ईरान तक आते आते उनमे कुछ वैमनस्य उत्पन्न हो गया और वें दो समूहों में विभक्त हो गए। ऋग्वेद का रचना भी उस समय प्रगति पर रहा होगा तभी तो वेद के पूर्वार्द्ध में सुर और असुर शब्द पर्यायवाची दिखाई पड़ते है और उत्तरार्द्ध में विलोम। यही कारण है कि ईरानी आर्य भारतीयों को और भारतीय आर्य ईरानियों को असुर समझते है। ईरानी साहित्य में सुर का अर्थ और भारतीय साहित्य में असुर का अर्थ दानव किया जाता है। सम्भवतः इन दोनों में हुआ प्रथम युद्ध ही देव-दानव युद्ध रहा हो। कहते है जब देव दानव युद्ध शुरू हुआ और देवराज इंद्र युद्ध के लिए तैयार हुए तो इन्द्राणी ने उनको तैयार करते हुये उनकी कलाई पर एक रेशम की डोरी बाँध दी ताकि वह ...

हजार सिर का हिन्दू

एक जंगल में एक विचित्र पक्षी रहता था जिसके दो सिर थे किन्तु शरीर एक था। दोनों सिर एक दूसरे से सदा झगड़ते रहते थे। एक दिन जब वे भोजन की खोज में थे तो एक सिर को स्वादिष्ट फल मिला। उसने उसकी तारीफ की तो दूसरा सिर भी उधर घूमा जिस कारण दोनों में झगड़ा हो गया। दोनों सिर जानते थे कि उनका पेट तो एक ही है ,यह खाये या वह; जाना तो उसी पेट में है, किन्तु दूसरा सिर लेने की ठान बैठा। फिर एक दिन वह पक्षी भोजन की तलाश में निकला तो दूसरे सिर को एक फल दिखाई दिया। वह उसकी और लपका तो पहले सिर ने उसे चेताया कि वह जहरीला फल है उसे मत खा किन्तु दूसरे सिर ने कहा," उस दिन तूने मुझे उस स्वादिष्ट फल का स्वाद नही चखने दिया था तो मैं अब तेरी बात क्यों मानूँ?" यह कहकर दूसरे सिर ने वह फल खा लिया।उसके बाद वह पक्षी तड़प-तड़प कर मर गया। हिन्दू धर्म भी ऐसा ही पक्षी है। इसके तो दो नही बल्कि जातियों के रूप में हजारों सिर हैं। सब एक दूसरे से सदा झगड़ते रहते हैं। सब को पता है कि उनका पेट तो एक हिंदुत्व ही है किन्तु एकदूसरे को नीचा दिखाने के लिए उस पेट में न जाने कैसे कैसे विचाररूपी फलों का भोजन भरते रहते है। यह बात ...

भाषाओं के झगड़े

बचपन में एक कहानी बड़े चाव से सुनते थे। दो बिल्लियां एक रोटी के लिए आपस में झगड़ रही थी। तभी वहाँ एक बंदर आ गया। दोनों ने अपना झगड़ा सुलझाने के लिए बन्दर की मदद माँगी।बन्दर एक तराजू लाया और रोटी के दो भाग करके अलग अलग पलड़ों में रखकर तोलने लगा। एक पलड़ा भारी होकर नीचे झुका तो बन्दर ने उस पलड़े की रोटी में से एक टुकड़ा तोडा और खा लिया। अब दूसरा पलड़ा नीचे झुक गया। बन्दर ने उस पलड़े में से रोटी का एक टुकड़ा तोडा और खा गया। अब पहला पलड़ा पुनः भरी होकर झुक गया। बन्दर ने उसमें से टुकड़ा तोडा और खा गया। इसी प्रकार रक पलड़े की रोटी समाप्त हो गयी और दूसरे पलड़े पर एक छोटा टुकड़ा बीच गया। बिल्लियाँ बोली भैया हम अपना झगड़ा खुद सुलझा लेंगे, आप हमें हमारी रोटी दे दो । इस पर बन्दर ने कहा कि यह तो मेरी मेहनत हुई और बचा टुकड़ा भी उठाकर खा गया। झगड़ने वाली बिल्लियाँ एक दूसरे का मुँह देखती रह गयी। शायद कश्मीर के मामले में भारतीय सरकार को यह कहानी ठीक लगी और पकिस्तान के किसी तीसरे देश के मध्यस्त होने के प्रस्ताव को भारत सरकार लगातार ठुकराती रही। किन्तु भाषाओं के बिल्ली की तरह झगड़े में सरकार विवेक न दिखा सकी और बीच में ...

हिन्दू पतन और उत्थान का प्रयत्न

एक व्यक्ति था। एक बार उसने सोचा कि यह आकाश मेरा है और मैं इसकी रक्षा करूंगा। यह सोचकर उसने एक बड़ा सा घर बनाया है और उसके आकाश की सुरक्षा करने लगा और संतुष्ट हो गया। किंतु काल का कराल बड़ा हठी होता है। घर टूट गया और वह व्यक्ति शोकमग्न हो गया। दुख से वह विकल हो गया। फिर उसने एक छोटा सा घर बनाया और उसके आकाश की सुरक्षा करने लगा और इसी में संतुष्ट हो गया। किंतु काल के क्रूर हथौड़े से वह भी कितने दिन बच सकता था? टूट गया। और व्यक्ति फिर से दुख और शोक से भर गया। उसके दुखों का कुछ सानी नहीं था। फिर उसने एक झोपड़ी का निर्माण किया तथा उसके आकाश पर अपना अधिकार जमकर उसकी सुरक्षा करने लगा और उसमें ही संतुष्ट रहने लगा। किन्तु कोई प्राकृतिक आपदा उसे भी नष्ट करके चली गई। मनुष्य फिर से भारी शोक में डूब गया। अब उसने एक घड़े का निर्माण किया और यह मेरा आकाश है ऐसा सोच कर उस घटाकाश की रक्षा में मग्न हो गया और संतुष्ट रहने लगा। किंतु काल ने उसे भी ग्रास बना लिया। अब वह मनुष्य पुनः दुख के सागर में डूब गया। वह मनुष्य एक सनातनी हिंदू था और जिस आकाश की वह रक्षा करता था वह था उसका धर्म। जैसे ही धर्म पर अधिका...

वेद के प्रकाश से प्रकाशित

जब महर्षि दयानंद का स्वर गूंजा कि वेदों की ओर लौटो तो पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोगों ने ऋषि को अनपढ़ की संज्ञा दे दी। उन्हें आधुनिकता और विकास के विरुद्ध माना गया। किंतु वह तथाकथित प्रबुद्ध लोग यह भूल गए कि रात्रि का विकास सदैव सुबह में होता है और वेद तो सुबह का सूर्य है। सूर्य जो पिछली रात पश्चिम की गोद में जा चुका था अब पुनः पूरब की गोदी में अंगड़ाई लेकर आने वाला है। वेदों की ओर लौटने अर्थ यही तो है कि ज्ञान का सूर्य पुनः उगाकर इस विश्व को प्रकाशित किया जाए। हमारे पास ज्ञान का विपुल भंडार है इसे अपने जीवन में उतारा जाए। हमारे ऋषियों महर्षियों की वर्षों की तपस्या के तप का प्रकाश विभिन्न सूत्रों और श्लोकों के रूप में वेद नामक सूर्य से निःसृत हो रहा है। उससे हमें आत्मसात करना है। उस ज्ञान को हमें अपने आचरण में ढालना है। हमें सत्य को पहचानना है, सत्य में जीना है, सत्य रहना है, सत्य को खोजना है, सत्य को जानना है, और सत्य को अपना जीवन बनाना है। जब चारों और असत्य का साम्राज्य हूं तो सत्य का मार्ग कांटो भरा होता है किंतु इस साम्राज्य को नष्ट करके सत्य के मार्ग को सुगम बनाया जा सकता है इसलिए हमें...

प्रहरी

अभी-अभी कारगिल विजय दिवस बड़ी धूमधाम से पूरे देश में मनाया गया। प्रत्येक देशवासी ने युद्ध में शहीद हुए प्रहरियों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। देश का बच्चा बच्चा इन अमर शहीदों का ऋणी है। वे लोग सीमा पर जागते हैं तो हम लोग अपने घरों में चैन से सो जाते हैं। देश की सेना अर्ध सैनिक बल एवं अन्य सुरक्षाकर्मियों को कोटि कोटि नमन बार बार नमन। यह लोग नहीं है ऐसे ही नहीं है पूरे देश को इन पर गर्व है और कोई एक संगठन जिस पर हर कोई गर्व कर सकता है वह सामान्य कार्य तो नहीं करता। प्रहरी का कार्य निश्चित रूप से कंटकों दुर्गम और कठिन है। ऐसा नहीं है कि प्रहरी का महत्व पाकिस्तान के जन्म के साथ या चीन के जन्म के साथ या भारत के आजाद होने के साथ ही बढा हो। जब से मानव ने खानाबदोश की जिंदगी को छोड़कर इकट्ठे होकर कबीलों में रहना सीखा है तब से प्रहरियों का जीवन में बड़ा महत्व रहा है। जिस प्रकार देश के प्रहरी हमारी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है इसी प्रकार पुराने समय में कबीलों, जनपदों, राज्यों के प्रहरी भी अपनी जनता की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे। और इसीलिए संभवत था प्रहरियों को समय का ताज पहनाया गया है। प्...

भोला और भांग

शिव ,शंकर, महादेव ,भोला बाबा, आदि नामों से जाने जाने वाले भगवान शिव आज शिव भक्तों के द्वारा ही परिहास का विषय बन कर रह गए हैं। शिव जो परम शक्ति है, सृष्टि कर्ता है,सृष्टिपालक है, सृष्टि संहारक है और जीवन का मूल है उस भगवान शिव को लोगों ने भांड बना कर रख दिया है, भंगड़ बना कर रख दिया है, और शिव की शक्ति मां पार्वती का तो जैसे बस एक ही काम रह गया है भांग के पत्ते तोड़ने उसको घोटने में घोटना और शिव को पिलाना। कावड़ियों द्वारा बजाए जा रहे भक्ति संगीत में आप यह सब सुन सकते हैं महसूस कर सकते हैं कि किस तरह ईश्वरीय प्रतीक को एक मानवीय रूप देकर उसका चरित्र हनन किया जा रहा है। लोग ऐसे ऐसे कथित भजन सुनकर नाचते हैं कूदते हैं, जय जय कार करते हैं । यह लोग समाज के समक्ष कौन सा आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं? ईश्वर के विषय में एक बात स्पष्ट है कि वह है सृष्टि को उत्पन्न करता है पोषण करता है और संघार करता है किंतु उसमें सम्मिलित नहीं है आसक्त नहीं है। वह तो पूरी सृष्टि को कर्म करने के लिए स्वतंत्र रखता है। उसकी स्थिति प्रतिकात्मक रूप से ऐसी होती है जैसे एक भांग पिए हुए व्यक्ति की स्थिति होती है जिसे अपने ...

नाम व उपनाम

कुछ दिन पहले एक मित्र ने Facebook एक पोस्ट लिखी। पोस्ट का मुख्य विषय जातिवाद का विरोध करना था। पोस्ट बहुत अच्छी थी किंतु कॉमेंट में किसी महानुभाव ने उनसे ही अपना उपनाम नाम के पीछे से हटाने की बात कह दी। वह मित्र इसके लिए सहर्ष तैयार भी हो गये। किंतु इस बातचीत में मेरे मन में कुछ हलचल सी मच गई। बचपन से मैं स्वयं हूं उपनाम से दूर ही रहा हूं। किंतु अब मुझे लगता है नाम और उपनाम जीवन में इन दोनों की उपयोगिता है। हम प्रायःअपने बच्चों का नाम देवियों देवताओं ऋषियों मुनियों एवं प्रतापी राजा आदि के नामों से लेकर ही रखते हैं।यदि किसी अन्य प्रकार का नाम रख दिया जाये तो समाज के लोग न केवल आश्चर्यचकित होते है अपितु ऐसा नाम न रखने की सलाह भी देते है। ऐसा क्यों होता है? इसका रहस्य हमारे समाज की मनोवैज्ञानिक परंपराओं में छुपा हुआ है। आप एक व्यक्ति को लगातार पागल व्यक्ति कहकर संबोधित कीजिए कुछ समय बाद आप उस व्यक्ति में पागलपन को महसूस कर सकेंगे। क्योंकि बार बार ऐसा संबोधन सुनने पर उसके मन में यह विचार घर कर जाता है कि वह अन्य लोगों से अलग है और उसमें कुछ तो कमी है और फिर मन इस बात को मानने लगता है और ...